प्रसिद्ध पिता

जब ग़रीबी में जी रहे माँ-बाप अपने बच्चों को दो-पाँच रुपये देकर खुशियाँ जीतने में लगे थे, ज्ञानप्रकाश एक कल्पनालोक रचने में लगा था. पत्नी को भी जुटा रखा था.
रिचा और श्लोक माँगते भी वह चीज़ थे, जिसके लिए पार्वती को शिवजी की मनुहार करना पड़े.
“पिताजी, हवा नहीं चल रही !”
ज्ञानप्रकाश ने कभी अनसुना नहीं किया और और ना ही कभी झुंझला कर कहा, ” तो मैं क्या करूँ?”
उसने हवा चलाने की कोशिश की, और जैसे तैसे चलाई भी. अपनी गीली धोती के दो सिरे खुद पकड़ता और दो पत्नी को थमाता और ज़ोर ज़ोर से हिलाकर, हवा ही नहीं, ठंडी हवा को घेर लाता. बस फिर क्या था, बच्चे भी जुट जाते बारी बारी. गर्मी और उमस को खिसकना ही पड़ता. एक दिन तो रोशनदान में रस्सी बाँध कर उसने चाँद के दो टुकड़े कर दिए. आख़िर रिचा और श्लोक को हर मान कर कहना ही पड़ा, “नहीं पिताजी हमें अलग अलग चाँद नही चाहिए. एक ही अच्छा है.”
क्या नहीं किया ज्ञान बाबू ने. सूरज उगाया, बारिश कराई, अहाते में खड़े नीम से बीते युगों की कहानियाँ सुनवाई. मगर मिठाई के नाम पर घर में हलवा बनता था और खिलौने भी घर में ही ईजाद होते थे.
रिचा और श्लोक का ध्यान कभी पैसे पर गया ही नहीं. दोनो आज पचास पार हो गये हैं. पैसा आज भी उनके पास बस ज़िंदगी की गाड़ी चलाने लायक ही है, उनसे कहीं ज़्यादा पैसे वाले हैं वे दो- पाँच रुपये से अपनी खुशियाँ लूट कर भागते फिरने वाले बच्चे. मगर ना तो उनमें कोई इसरो में प्रसिद्ध वैज्ञानिक है और ना ही कोई देश का प्रसिद्ध साहित्यकार.
ज्ञानप्रकाश आज इस दुनिया में नहीं है. दुनिया शायद नहीं मानती है, पर वह एक प्रसिद्ध पिता है.

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