सौगंधी कल मर गयी

आप-पास वालियों ने नहला के तैयार तो कर दिया है, पर श्मशान तो चार आदमी ही उठा कर ले जाएँगे ना.
आधी उम्र तो शरीर को भरने और ढकने के लिए शरीर को ही बेचा, और फिर ढल गया तो बाजू वालियों का चौका बर्तन किया, कपड़े लत्ते धोए, फिर शरीर को भरने ढकने के लिए ही. बाकी ना कोई मतलब और ना कोई मकसद. क्या कहेंगे इस को अर्थशास्त्र में? छोड़ो अर्थशास्त्र को, समाजशास्त्र में ही बताओ क्या कहेंगे- तन को बेच कर तन को भरने ढकने की इस नीति को, नियति को?
मंटो ने बताया था सौगंधी के बारे में, जब वह जवान थी. दारोगा से लेकर, कपड़ा व्यापारी तक उसकी किराए की खोली में आते जाते थे.
उधर जब भी गया, सीधा रास्ता छोड़ कर मैं भी उसकी गली से ही गुज़रा , पर खोली में जाने की कभी हिम्मत नहीं हुई. इज़्ज़तदार आदमी हूँ.
चार आदमी भी मिल जाएँगे. एक तो यह बांडिया रहा, कल तो पी के पड़ा था पर सुबह सुबह तो काम आ ही जाएगा. एक कालिया तो है ही. कमीना है पर लाश तो उठवा ही देगा. दो कोई और पकड़ लाएँगे. इनमे से कोई भी कभी सौगंधी का ग्राहक नहीं रहा.
एक तन लाई थी, तन ले गयी. किसा ख़त्म, पैसा हजम.

कृपया ध्यान दें: यदि सौगंधी की मौत पर आप को अपनी संभ्रांत संवेदना व्यक्त करनी है तो अपने ही पेज पर करें या कहीं और. मैं एक इज़्ज़तदार आदमी हूँ और मेरे बच्चे भी अब बड़े हो गये हैं.

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व्यस्त वृद्धा

मुझे कोई दस बरस ऐसे कस्बे में रहना पड़ा जहाँ बहुत कम लोग मुझे जानते थे. मेरे पढ़ने लिखने और ‘परम सत्य की खोज’ की धुन के लिए ये दस बरस बड़े मुफ़ीद थे. मैं सारा सारा वक़्त अपनी बालकनी में बैठा लिखता पढ़ता रहता. वहाँ से मैं देखता था एक बुढ़िया पूरे दिन अपने घर के पीछे अहाते में चिड़ियों को दाना देने, कपड़े तह करने, पौधे संभालने या कुछ भी करने में व्यस्त रहती थी. कभी खाली नहीं बैठती थी. मैं सोचता- ‘जीवन आख़िर मनुष्य को क्या बना देता है. बड़े बड़े सपने देखकर, भागमभाग करके आख़िर छोटे छोटे कामों में इंसान अपना मन ऐसे लगा लेता है जैसे इन्हीं कामों के लिए उसका जन्म हुआ था.’ जीवन की इस निस्सारता को देख मैं विचलित हो जाता और फिर तन्मयता से अपनी किताबों में सिर गाड़ देता.
कभी नीचे उतरता तो बुढ़िया को नमस्कार कर लेता था. मैं सोचता था अगर एक बार बातचीत कर ली तो फिर रोजाना बुढ़िया की राम कहानी सुननी पड़ेगी.
एक दिन मैं नमस्कार के बाद भी नज़र नहीं हटा पाया क्योंकि वह चिड़ियों को ऐसे दाने डाल रही थी जैसे कोई बच्चों के साथ खेलता है. जब उसने मेरी तरफ नज़र की तो उसकी आँखों मे इतनी आत्मीयता थी की मेरे होंठ अनायास खुल गये.
” अच्छा है अम्मा, आपका पूरे दिन ऐसे ही टाइम पास हो जाता है, वरना तो दिन काटना मुश्किल हो जाए.”
उसने कहा,” तुम भी तो अपना दिन किताबों के साथ काट देते हो.”
मैं किताबों में टाइम पास नहीं करता यह जताने के लिए मैंने कहा, ” मुझे बहुत कुछ जानना है अम्मा. मैं समझता हूँ कि हमारा जीवन इस जीव-जगत, इस ब्रह्मांड की रचना को समझने के लिए हुआ है. बाकी तो सब बस जीवन गुजराने के लिए है.”
बुढ़िया ने संयत स्वर में कहा,” पर तुम यह कैसे कह सकते हो कि उस सत्य को जानने का मार्ग केवल शब्द और किताबें हैं बेटा. सृष्टी की हर चीज़, हर घटना में भी तो वह सत्य छुपा है….” वह ज़रा रुकी फिर बोली, ” किसी महात्मा ने कहा है, दीया भी सूरज की रोशनी से ही जलता है.”
मैं अवाक खड़ा रहा गया. मेरे मुँह से बस ‘ यस’ निकला, धीमे से. मैं सोच रहा था अगर कोई स्टीफ़न हॉकिंग से भी पूछे तो वह यही कहेगा, ” ऑफ कोर्स, दि लाइट दैट कम्ज़ फ्रॉम ए लैम्प ऑल्सो बिलॉंग्स टू दि सन.”
किताबें मैं आज भी बहुत पढ़ता हूँ, पर उस दिन के बाद मैंने किसी भी छोटी से छोटी चीज़ या घटना को निरर्थक नही समझा.

झाड़ू-पोंचा बनाम जीवन-दर्शन

छुट्टी के दिन जानाबाई पोंचा लेकर मेरे पीछे ऐसे पड़ जाती है जैसे स्टेशन पर किसी लावारिस के पीछे डॅंडा बजाता पुलिसवाला.
उस दिन मैं बच गया था, लगता है जानाबाई ने जल्दी में मुझे इग्नोर कर दिया था.
‘ सब बोलते हैं, ये झोपड़ पट्टी के लोग क्या मिर्ची खाते हैं. अरे भाभी मिर्ची नहीं खाएँ तो हो गया हमारा तो. एक आदमी पूरा सालन खा जाएगा, बाकी बैठो. हमको पता है ना मिर्ची के बिना कैसे चलेगा हमारा. बोलना आसान है. हमको कोई चाव थोड़े होता है मिर्ची खाने का. बाद में आदत पड़ जाती है. हम थोड़े ना आप लोग के माफक खाना खाते कि यह भी वो भी सब कुछ कटोरे भर भर के. हम को रोटी या राइस खाना होता है, थोड़े से रस्से या चटनी के साथ. बताओ मिर्ची नहीं खाए तो कैसे चले?’
मुझे लगा जानाबाई एक पुरानी सी फटी जिल्द की किताब है. मैं कान लगा के पढ़ने लगा.
एक और दिन-
‘ नौकरी नही है, पर घर पर एक मिनिट नहीं बैठेगा मेरे घर वाला. बाहर ही बाहर. क्या है हम बच्चे होते तो माँ बाप कुछ भी करने को, चाहे ‘बात’ करने का हो या झगड़ा, हम को खोली से बाहर निकाल देते. बस आदत पड़ जाती फिर. ऐसा आप लोग के जैसे पास पास बैठे तो सारे दिन मुँह बंद रहेगा, खोला नहीं कि मार पीट गाली गलोच. औरत मर्द में दूरी ही अच्छा है भाभी.’
और कल कह रही थी, ‘ एक या दो बच्चा करो. हम को सिखाता है. अरे हम ऐसे ही हाड़ तुडा कर, आधा पेट भर कर जिनगी काट दें. कोई लॉटरी तो निकलेगी नहीं. दो चार में से एक बच्चा बच गया और निकल गया तो तकदीर बदलेगी. नहीं तो पीढ़ी तक ऐसे ही मरना पड़ेगा. इनको ज़्यादा पता है? हम तो जानवर है ना.’
मुझे लगा हमारे नीति आयोग को एक बार जानाबाई को अपनी बैठक में बुला कर उससे कुछ सीखना चाहिए.

दुख का खेल

बड़े दर्द को छोटी छोटी परेशानियों की भीड़ पसंद नहीं आती है. दिल का दौरा पड़ेगा तो ज़ुकाम और दाँत दर्द को भाग कर दुबकना पड़ता है.
वर्मा जी शुरू हो गये. ” जवान बेटी के अचानक चले जाने पर तीन साल तक मुझे कुछ नहीं सूझा. उबरा था कि पहले तो इस औरत ने बखेड़ा खड़ा कर दिया. अब लड़के की पूरी ज़िम्मेदारी मुझ पर है. बस यह एक बार सेट्ल हो जाए. ऊपर से पेंशन का पचड़ा चल रहा है.”
मैं मन ही मन कह रहा था- “इन परेशानियों का शुक्र करना चाहिए यार कि इतने बड़े गम को ढांप के बैठी हैं.”
पर कुछ बोला नहीं, क्योंकि चोट पर हल्की सी चोट भी बहुत पीड़ा देती है, और वर्मा जी सोचेंगे मैं उनके हालात को संजीदगी से नहीं ले रहा हूँ. मैंने सिगरेट केस उनके सामने कर दिया.
उन्होंने सिगरेट निकालते समय मुझे ऐसे देखा जैसे मैं उनके दुख-दर्द को हल्के से ले रहा हूँ. मैं उठा और दो गिलास लेने किचन में चला गया.
थोड़ा सुर्खरू होते ही वे फिर शुरू हुए. ” इस औरत के मसले का तो मैं अब आदी हो गया. भाड़ में जाए. बस लड़के की फ़िक्र है. पेंशन का क्या है रिवाइज़ नहीं भी हुई तो मिल तो रही है ना.”
” चलो दो तो फिलहाल समेट लिए, यह भी सुलट जाएगा”, मेरे मुँह से निकल गया.
” कैसे ? “, उनकी समझ में नहीं आया.
मैंने कहे सुने जुमले से तुरंत बात को संभाला , ” जो दर्द देता है वर्मा जी, वही दवा भी करता है.”
पर मन ही मन सोच रहा था- ‘ जब तक ज़िंदगी कस के नहीं मारती खैर मनाओ यार नहीं तो यह सब परेशानियाँ एक झटके में हवा हो जाएँगी.”

सामान्य जीवन

पत्नी घर पर अकेली थी. पति का छोटे भाई जैसा दोस्त चंदर आ गया तो चाय बना ली, और दोनो डाइनिंग टेबल पर बैठ गये. अंजाने में पत्नी का हाथ चंदर के बहुत नज़दीक चला गया. चंदर ने निमंत्रण समझ कर अपने हाथ में दबा लिया. पत्नी हाथ झटक कर खड़ी हो गयी. मुँह फेरे फेरे बोली, ” इससे पहले कि मैं तुम्हें बुरा भला कहूँ इस घर से बाहर निकल जाओ, और दोबारा कभी इधर मुँह मत करना.”
चंदर अपनी ग्लानि को अपने मौन में लपेट कर चला गया.
उसी दिन और लगभग उसी समय पति हॉलिडे इन की लॉबी में सुधा के साथ कॉफ़ी पी रहा था. दोनों की आँखें रोमान्स से ओत प्रोत थी. सुधा ने अपना हाथ आगे कर दिया. पति ने तुरंत थाम लिया, और कॉफी ख़त्म होने तक उसकी नाज़ुक अंगुलियों से खेलता रहा. वापसी में उसे घर छोड़ते वक़्त पति ने कहा, “सुधा, तुम इस घर में किराए पर रह रही हो. मैं सोच रहा हूँ कुछ शेयर पड़े हैं उन्हे बेच कर तुम्हें यह घर खरीद दूं.”
सुधा ने कस कर उसे अपनी बाहों में भींच लिया.

उस रात पत्नी बहुत अपसेट थी. सिरदर्द का बहाना करके जल्दी सो गयी. पति देर से घर आया. मन में उथल पुथल मची थी. लॅपटॉप पर कुछ करता रहा और फिर ड्रॉयिंग रूम में ही सो गया.

कई दिन बाद, एक शाम पति ने पूछा, ” चंदर कई दिन से नहीं आया , पहले तो हर हफ्ते एक चक्कर लगा लेता था?
कुक्कर की सीटी बाजी, और पत्नी दौड़ कर किचन में चली गयी.
फिर कई दिन बाद , एक सुबह पत्नी ने पूछा,” आप शेयर बेच कर एक फ्लॅट लेने की कह रहे थे?”
पति ने अपना मोबाइल निकाला, ओफिस का नंबर मिलाया और कुछ निहायत ज़रूरी बात करते हुए घर से निकल गया.
जीवन अपनी सामान्य गति से चल रहा था.

रात हो गयी तो क्या है फिर भी चलना है मुझे !
कल के सूरज से ज़रा आगे निकलना है मुझे !!

मैं भी अपने गम पे रोऊँ दिल तो करता है मगर
क्या करूँ एक गम का दरिया पार करना है मुझे !!

उनकी हसरत थी उन्होंने कर दिया रोशन चिराग
सो गये जाकर वो पूरी रात जलना है मुझे !!

कौन है गौतम मैं जिसके नाम से बदनाम हूँ
मिले तो कहना उसे कि उससे मिलना है मुझे !!