एक ग़ज़ल

दिन का चेहरा देखिए जैसे दहकती रात है !
है खुशी बेचैन गोया गम कहीं पर पास है !!
तन्हा लड़ता एक दिन उस घर सा तू हो जाएगा
जिसमें कोई है नहीं चूल्‍हे में लेकिन आग है !!
कुछ तो अब्बा की भी सुनते खुद कहेगा देखना
दिल की जो सुनते हैं उनके काम की यह बात है !!
क्या कहूँ बच्चों को अब मैं किसलिए बेज़ार हूँ
आज भी सपने में माँ दिखती है पर नाराज़ है !!

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अकेलापन

पिचहतर साल की विधवा ने अपनी पचास साल की कुँवारी बेटी से पूछा,’ कमला, सूरज उग गया क्या?”
” अम्मी, सूरज उगेगा तो सारी दुनिया को दिखेगा, अकेली कमला को नहीं.”
” पर मुझे तो नहीं दिखेगा, ना ”
‘क्यों नहीं दिखेगा, तेरी सूरज से कुछ अनबन है?’
” अरे अभी सुबह जाकर तो आँख उनीन्दी हुई हैं, खोलूँगी तो खुली की खुली रह जाएँगी”
कमला के पिता माँ को जल्दी ही अकेला छोड़ गये थे. कमला माँ को अकेला छोड़ कर कैसे चली जाती. कमला भी अकेली रह गयी.
आधी रात बीत गयी तो कमला ने माँ से पूछा, ” माँ चाँद आ गया होगा?”
‘और क्या, आएगा तो सबसे पहले मेरे पास हाज़िरी लगाएगा. सो क्यों नहीं जाती. कौनसा चाँद के बिना रात का सिंगार अटका हुआ है.”
बात कुछ नहीं थी. अकेलापन बीच में आते ही दोनों उस पर बिल्लियों की तरह झपट पड़ती थी.