मैं और शिबी

आज मुझे कोई सबसे ज़्यादा याद है तो शिबी.
मेरी पत्नी मुझे छोड़कर चली गयी थी और मै समय के प्रवाह के साथ बह रहा था , तो शिबी से मेरी मुलाकात हुई. जहाँगीर आर्ट गॅलरी में, जब उसकी कुछ ढूँढती आँखें मेरी खोई हुई आँखों से टकराई, मुझे याद है वह क्षण. हम फिर पूरे दिन साथ रहे, पूरी रात भी, और फिर कभी अलग नहीं रह पाए. मेरे और मेरी पत्नी के बीच अहम का एक पहाड़ था, और मेरे और शिबी के बीच अगर कुछ नहीं था तो अहम.
उसने हमारा रिश्ता ऐसे सहेजा हुआ था जैसे वाद्य में सुर होते हैं. हम आत्मसखा थे. बीस साल साथ रहे. पिछली २३जुलाई की रात तक, जब मैं एक बुरे सपने से बाहर आया, शिबी का हाथ मेरी छाती पर रखा था. एकदम ठंडा. पहले तो मुझे लगा यह मेरा हाथ है और मैं मर चुका हूँ. मगर नहीं, ऐसे खूबसूरत रिश्ते में भाग्यशाली पहले जाता है.
वह जब औरत के लिए कुछ कहता था तो बोलता- ‘ ये रोती हुई रानियाँ’ और पुरुष के लिए कहता- ‘ तुम बेदिल बदतमीज़’. इस से ज़्यादा कठोर शब्द उसने कभी इस्तेमाल किए. मुझे नहीं पता शिबी पुरुष था या स्त्री. हालाँकि हम ज़्यादातर एक ही बिस्तर पर सोते भी थे. उसे पता था मैं पुरुष हूँ. मैं उसे जैसा मन हुआ वैसे बुलाता था- ‘ आज शाम को कहाँ जाना चाहोगी’ या ‘अब तैयार भी होगा या इस पेंटिंग में ही उलझा रहेगा’. सहूलियत के लिए यहाँ उसे पुल्लिंग बता रहा हूँ.
मैने उस दिन उसे अपने हाथों से नहलाया. एक छोटे बच्चे सा लग रहा था. मगर मुझे आज भी नहीं पता शिबी एक पुरुष था या स्त्री थी .कभी मेरे पिता सा, कभी माँ सा, कभी पत्नी सा, कभी भाई सा, कभी बहन सा, वह मेरा सब कुछ था. मैं एक लेखक था और शिबी एक पेंटर. वह ज़्यादातर मेरी कहानियों की पैंटिंग बनाता था. उस के जाने के बाद मैने कोई कहानी नहीं लिखी है. मेरी कहानियाँ तो आपने पढ़ी हैं, मगर जब आप शिबी की पेंटिंग देखेंगे तो मेरी कहानियाँ उनके सामने छोटी पड़ जाएँगी.
बाद में सभी लेखक और आर्टिस्ट मित्रों को फोन किया. मेरी पत्नी भी आई थी. सब उठ कर जा रहे थे तो मेरे पास आई. “अब क्या करोगे? तुम्हें तो अपनी देखभाल करना भी नहीं आता. चाहो तो मेरे पास आकर रहो.”
मैने कहा,” नहीं, अब संभव नहीं होगा. अब तो मेरा एकांत ही मेरी दुनिया है.”
मुझे लग रहा था. प्रलय के बाद मैं अकेला बचा हूँ और सृष्टि का फिर से सृजन होना है.

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प्यार से इतर,कुछ और

है कुछ प्यार से इतर, प्यार से भी शायद आगे. जिस तक हम नहीं पहुँच पाए. ठहर गये प्यार पर ही- ओत-प्रोत होकर, स्तब्ध होकर, या फिर बौखला कर .

१९७१ की ग्रीष्म ऋतु. बस दो बार आँख मिली थी. जब नर्मदा बुआ उसे ओक से पानी पिला रही थी. धार टूटी तो उसने ऊपर देखा. आँखे मिली तो बुआ ने झट से वापस धार बाँधी. फिर बुआ की नज़र धार से हटकर उस के चेहरे पर भटकी और फिर धार टूटी और फिर आँखें मिली, बस.

उसके बाद जब एक ओर से पलकें उठी दूसरी ओर से झुक गयी.
फिर दोनों का विवाह हो गया. उसका नांगल की रामकली से और बुआ का माजरे के रामप्रसाद से जो घरजमाई बन कर सीहोर आ गये. रामप्रसाद फूफा जी तीस साल सीहोर में रह कर भी प्रवासी से ही लगते रहे .

वह इंतज़ार करता था कि नर्मदा बुआ का कोई काम निकले तो जी जान लगा दे. प्यार नहीं था यह. कुछ और था.

एक दिन बुआ के ससुराल गोंद के लड्डू पहुँचा कर मोटर साइकल से लौट रहा था कि दुर्घटना में चल बसा. रामकली उस दिन से बुआ को दिन रात गालियाँ देती है. नाम नहीं लेती बुआ को रांड़ कहती है. बुआ बुरा नहीं मानती. मगर रामकली को जब भी कुछ चाहिए बुआ के पास आ धमकती है. बुआ को चाहे भूखा सोना पड़े पर रामकली को खाली हाथ नहीं लौटाती.

२००१ की शीत ऋतु..नये शॉल और स्वेटर के लिए १५०० रुपये बचा रखे थे बुआ ने. कई दिन से मुझ से कह रही थी अब के रेवाडी जाए तो ला के देना. एक दिन गया तो रामकली बुदबुदाती निकल रही थी, ‘ रांड़ कहीं की! देगी नहीं तो क्या करेगी!’
मैने पूछा तो बुआ ने टाल दिया , ‘ अरे बेटा, संदूक खोली तो शॉल और स्वेटर तो पिछले वाले ही नये के नये रखे हैं. सोचती हूँ क्यों खर्चा किया बिना बात.’
हमारे प्रवासी फूफा ही क्या पूरी दुनिया ही इस क़िस्से से अनजान हैं.
क्योंकि यह प्यार नहीं है , कुछ और है . .

जमना मौसी की हँसी

वैसे तो जमना मौसी हमारी कुछ भी नहीं लगती थी, पर इतनी हमारी थी कि राशनकार्ड में भी उनका नाम था. कोई बाहर से आए तो लगे घर की मालकिन वही है.जमना मौसी को ही पता होता था सुपारी कहाँ रखी होगी और छुआरे कहाँ. घर का पूरा काम काज देखती थी, पर दो पैसे भी अपने हाथ में नहीं रखती थी . उनकी जायदाद थी दो जोड़ी मोटे कपड़े जो बहुत दिनों तक नहीं फटते थे, और फटने से पहले चाचीज़ी दो और लाकर तैयार रख देती थी. सारे दिन हँसती रहती थी जमना मौसी. कोई उनका मज़ाक उड़ाए तो उनकी हँसी और खिल जाती थी.
सब लोग बैठ गप्पे मारते जून की दोपहरी बीता रहे थे. सब जमना मौसी की खिंचाई कर रहे थे और जमना मौसी हंस कर लोट पलोट हो रही थी. मैं हमेशा की तरह चकित उन्हें देख रहा था. आख़िर पूछ बैठा, ” मौसी आप कभी दुखी या परेशान भी हुई हैं ज़िंदगी में?”
सब मेरा मुँह देखने लगे. मौसी इस पर भी हँस पड़ी और हंसते हंसते बोली, ” बहुत बेटा, बहुत रोई हूँ मैं तो. यह तब की बात है जब मेरी ज़िंदगी में बहुत खुशियाँ थी……. मेरी शादी एक बहुत नेक आदमी से हुई . बहुत प्यार करता था वो मुझे. हमारे तीन बच्चे हुए . दो लड़की और एक लड़का. बड़े प्यारे थे तीनो.” यह बताते हुए जमना मौसी अतीत में चली गयी थी पर चेहरे की मुस्कान बरकरार थी.
” फिर एक दिन मेरा आदमी मर गया.उस दिन बहुत रोई थी मैं.” मौसी की आँखें नम हो गयी थी पर चेहरे की मुस्कान ज्यों की त्यों थी.
” फिर मेरी बीच की लड़की एक दिन मर गयी. बहुत प्यारी थी. कई दिन तक उसको याद करके रोती रही मैं.” आँसू टपकने को था पर मौसी के चेहरे की मुस्कान बनी हुई थी.
” फिर एक दिन बड़े वाली लड़की भी मर गयी. मैं रोई, पर ज़्यादा नहीं.” मौसी की चेहरे पर हँसी खिलने सी लगी. मैं एकटक देख रहा था.
” और फिर एक दिन आया कि लड़का भी मर गया. मैं रोई नहीं ,इस बार हँस पड़ी. खूब हँसी.”
हम सब एक दूसरे का चेहरा देखने लगे.
मम्मी ने कहा, ” जाओ मौसी चाय का वक़्त हो गया आप चाय बना लो.”
मौसी हँसती हुई उठी, ” मेरे को पता है, तुम लोग बातें करोगे . मौसी सदमा लगने से हँसी होगी और फिर हँसने की आदत पड़ गयी. ऐसा कुछ भी नहीं है. जब आपका आख़िरी अपना बचे और वो भी चला जाए तो हँसी आती है. सोच कर डर लगता है पर मेरी मानो बहुत हँसी आती है.”
जमना मौसी हँसती हुई किचन में चली गयी.

सब यही पर हैं

पिताजी ने अस्फुट स्वर में धीमे से कहा, ” वो… बच्चा … कहाँ है?”
मेरी आँखों में देख कर वो जान गये, मैं समझा नहीं. उनके पीले पड़ गये चेहरे पर पौ फटने की सी एक मुस्कान आई. हाथ हिला कर बताना चाह रहे थे पर मेडिकल के तंत्र जाल में बँधे हुए थे. जब इंटेन्सिव केयर में सारी मशीनें लगा दी जाएँ तो समझ लो अंतिम समय आ गया है.
उन्होने एक उंगली से जो अभी तक आज़ाद थी, मेरे घुटने को छुआ और अस्पष्ट स्वर में कहा, ” स्लेट… थूक…. डाँट..!”
मैं समझ गया था. मैने अपनी मुस्कुराहट को बिखेर कर कहा,” है तो सही वह बच्चा. खेल रहा होगा यहीं कहीं आस पास. स्लेट भी रखी है अंदर वाली अलमारी में.”
” और वो… लड़का…छोटी छोटी… मूँछों वाला…?” उन्हें ज़ोर लगाना पड़ रहा था, पर दिल अपनी ज़िद पर था.
” वो भी यहीं किसी शीशे के सामने खड़ा कंघी कर रहा होगा.”
उन्हें मेरी जुगलबंदी में मज़ा आ रहा था. अपनी मुस्कान को थोडा उछाल कर बोले, “और वो….?
अबके मैं पहले ही समझ गया था, अच्छे संगतकार की तरह.
” वो दूल्हा? जिसकी घोड़ी के आगे आगे साफा पहन कर आप समधी के तुररे में चल रहे थे? वो भी यहीं है… और वो सुंदर सलोनी दुल्हन भी अपना घर अच्छे से बसाए बैठी है. ”
खुशी से उनकी आँख में एक आँसू तैर आया.
” और तुम तो हो ही…. सब हैं…बस तुम्हारी मम्मी…. नहीं दिखाई ….?” अपने सूखे होंठों पर जमने लगी मुस्कान को तोड़ते हुए वे पूरा ज़ोर लगा कर बोले.
” तो मैं…. ” और उनकी आँखें बंद हो गयी. हल्की सी मुस्कान फ्रीज़ हो गयी.
मैं मुस्कुराता हुआ उन्हें देखता रहा. एक मिनिट… एक घंटा .. एक ज़िंदगी.. या पता नहीं एक युग बीत गया. नर्स के आने की आहट से मेरी तंद्रा टूटी. मेरी मुस्कुराहट देख कर, उसने फूर्ति से पिताजी की नब्ज़ पकड़ी. वो धक रह गयी.
मैं अब भी मुस्कुरा रहा था.
” ही इज़ नो मोर !”
” जी मुझे बता कर गये हैं.”
उसे लगा मैने संतुलन खो दिया है.
” किसी को बुलाना है?”

” सब यही पर हैं .”

पहला पन्ना राम का

अपनी दर्शनिकता की झील में अर्धमग्न प्रोफेसर वशिष्ठ को समझ नहीं आ रहा कि उनकी चिंता कितनी अर्थपूर्ण है. पत्नी से भी नहीं बता सकते. उन्हें याद आ रहा है अपना पहला प्यार, जो एक ताबीज़ की तरह जीवन भर उनके साथ रहा है. ना कभी लड़की से दिल की बात कह पाए, बस दो साल तक बावले हुए फिरते रहे थे .

पहला प्यार किसी नीची डाली के फल की तरह पाने या हथियाने के लिए नहीं होता है, बल्कि वह तो एक झंझावात होता है जिसमें से गुजरना होता है. भूख बंद हो जाती है, किसी काम में मन नहीं लगता- या तो वही या कुछ भी नहीं- यह सारी कायनात उस एक इंसान के बिना बेमानी लगती है. सच है, बिल्कुल सच है. मगर वह तो एक इम्तिहान होता है, इंसान को ज़िंदगी के लिए तैयार करने का. यह नहीं की जी बस प्यार हो गया, पापा-मम्मी ने हाँ कर दी जी, कर लो शादी.

” यह क्या हो गया है इस नयी पीढ़ी को. सब कुछ इतना सरल, इतना सहज. औंधे मुँह गिरेगे यह देख लेना.” मन ही मन बुदबुदाते हैं.

फिर मन में प्रार्थना सी करते हैं- “जैसे भी हो बच्चे का दांपत्य जीवन सुखी और सफल रहे.”

अपनी हर बहस में उन्होनें दावे के साथ कहा है- “पहला प्यार कभी सफल बंधन हो ही नहीं सकता है. प्रेम को समझने की एक प्रक्रिया होती है, वह तो. एक विकट प्रक्रिया. उस से अगर आप गुज़रे नहीं तो ना आप प्रेम करने के काबिल हो पाएँगे, और ना ही एक अच्छे पिता या पति हो पाएँगे. यहाँ तक कि अच्छे इंसान भी नहीं बन पाएँगे.”

“क्या सोच में डूबे हो जी अब तो सब कुछ अच्छे से तय हो गया.” पत्नी ने चहक कर चुप्पी तोड़ी.

” बस ऐसे ही… तुम्हें लगता है शिखा से मिलने से पहले भी कभी विशाल के दिल में किसी के लिए प्यार रहा होगा.”

” ये लोगों के दिलों में ताकने झाँकने का काम आपका है, मेरा नहीं. ” , पत्नी ने चिढ़ कर कहा. और फिर थोडा सहज हुई , “आप अपनी ही बताओ ना, आप को किसी से प्यार हुआ था शादी से पहले….हुआ होगा तो आपको ही पता है ना. माँ पिताजी से कोई पूछकर देखता- ‘हमारा लड़का तो राम है, दूसरा राम!’ ”

थोडा विराम लिया, फिर मन की गहराई में डूब कर बोली, ” समझ लो, पहला पन्ना राम का जी . दुनिया के लिए जो लिखना है आगे लिखो. ”

– ‘ओह, इसका मतलब इन्होनें भी एक पन्ना तो छोड़ा हुआ है.’ वशिष्ठ जी मंद मंद मुस्काये.