मैं और मेरी नायिका

” कोई विकल्प नहीं छोड़ा है आपने मेरे लिए. बताइए, कैसे करनी है मुझे आत्म-हत्या? गले में फँदा डाल कर, तेरहवीं मंज़िल से कूद कर, या कुछ और है आप के मन में?”
चारूलता की वाणी में आवेश था, और पीड़ा पिघल कर आँखों से बह रही थी.
सब जानते हुए भी विस्मय का भाव लिए मैं उसे देख रहा था.
“मैं जानती हूँ विक्रमजीत अब कभी नहीं लौटेगा. और यदि आप सोच रहें हैं कि मैं जीवन भर विरह की ज्वाला में जल कर लोगों की सहानुभूति की प्रतिमा बनूँ तो यह आपका भ्रम है. मैं जान दे दूँगी…’ उसका स्वर टूट गया और वह फूट फूट कर रोने लगी.
नायिका के लिए इस तरह रोना अपेक्षित भी है और अनिवार्य भी.
मैं जानता था रो कर थक जाएगी तो असहाय नज़रों से मुझे देखेगी. मन में जाग रहे पितृ भाव को मैंने दबा दिया.
मैने अपने स्वर को साध कर कहा, ” आगे क्या होगा तुम्हें कुछ नहीं पता. आत्म-हत्या और जीवन भर के विरह के बीच बहुत और कुछ है अभी. तुम जाओ अपने कमरे में, मेरे पाठक तुम्हें उस सलवट विहीन सेज पर विक्रम की याद में आँसू बहाते देखना चाह रहे हैं. जाओ, मेरा विश्वास करो, जितनी मुझे तुम्हारी चिंता है और किसी को हो ही नहीं सकती.”
चिंता, मात्र चिंता नहीं थी, मैं जानता हूँ.
सोच रहा था- ‘अभी तो राघव को आना है, चारू. एक परिपक्व प्रेमी, जो विक्रम की तरह केवल तुम्हारी देहयष्टि और निर्मल सौंदर्य से नहीं बल्कि तुम्हारे उस उदात स्त्रीत्व से प्यार करेगा, जिससे मैं तुम्हें नवाजूँगा. तुम्हारी विरह वेदना तो मैं प्रेम की वृष्टि से शीतल कर दूँगा. मगर..’
लगता है रोकर चारू की आँख लग गयी थी.
मगर मैं विचलित था- ‘ तुम कभी नहीं समझ पाओगी, मेरे प्रेम को चारू ! झुलस तो मैं रहा हूँ. तुम बस मुझे आदर भाव से देखती रहोगी, यह सोच कर कि मैं तो बस पकी हुई दाढ़ी, बिखरे बालों वाला एक हृदयहीन लेखक हूँ. मैं प्रेमी कैसे हो सकता हूँ.’
सच यह है कि तुम मेरी ही प्रेयसी हो. विक्रम और राघव तो मेरे प्रेम का अंशमात्र हैं.

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मन की बात

“मोहित देव…? फिज़िक्स के प्रोफेसर..? याद नहीं आ रहा.” रश्मि के पैर काँपने लगे तो उसने चौखट को पकड़ लिया.
” अरे मम्मी, आपके साथ पढ़ते थे, भिवानी में. खूब अच्छे से जानते हैं आपको. मुझे लाइब्ररी में बुलाकर पेरेंट्स के बारे मे पूछा. जैसे ही मैने आपके बारे में बताया, उछल कर बोले, ‘ अरे रश्मि! कितनी शालीन लड़की थी. बहुत तारीफ कर रहे थे आपकी. बोले, जब भी कुछ काम हो, मैं यहीं कॅंपस में रहता हूँ, अकेले. … लंबे हैं.. पतले से.. गौरे..” अक्षय को याद दिलाने का चाव चढ़ा था और रश्मि को लग रहा था कोई उस के दिमाग़ को एक भूंठे चाकू से बंदार रहा है.
जैसे तैसे बेडरूम तक गयी और बिस्तर पर ढह गयी. दिमाग़ में एक बिजली सी कौंधी.
” मैं तुम्हारे पीछे नहीं आऊंगा, देखना, एक दिन तुम मुझे ढूँढती हुई आओगी.” कोमल और संयत स्वर.
अति सज्जन और घोर अपराधी पुरुष में भेद करना कठिन है.
जब बड़े भाई को पता चला कि कॉलेज में एक लड़का उसके पीछे पड़ा है तो तूफान खड़ा कर दिया. लड़की का बड़ा भाई बड़ा बेवकूफ़ हुआ करता है. पिता प्रिन्सिपल से मिलने पहुँच गये. इस दीवाने पर तो भूत सवार था, ” माफी? प्यार करने के लिए माफी. प्यार तो श्रेष्ठ और सुंदर मनोभाव है.” पिता कुछ बोलते इस से पहले भाई और उस के दोस्तों ने उसे प्रिन्सिपल के दफ़्तर से बाहर खींचा और बुरी तरह पीटा.
लड़कों ने कहा,” मारो साले को, और मारो!” और लड़कियों ने हल्का सा मुँह खोल कर पीड़ा और विस्मय की नज़रों से पूरा दृश्य देखा.
बस एक बार फिर सामने आया था. ” मैं तुम्हारे पीछे नहीं आऊंगा अब…देखना .. ” वही कोमलता वही सहजता जिसे याद करके मन काँप उठता है.
शादी के ५ साल बाद जयपुर में दिखा एक दिन. दिल किया उन्हें बता दूं. फिर सोचा, बबूल को पानी देना ठीक नहीं. और कुछ दिन बाद ही अक्षय के पापा को एक जीप टक्कर मार कर भाग गयी. किसने किया, पोलीस को कुछ पता नहीं चला.
जयपुर छोड़ कर इलाहाबाद आ गयी. वह यहाँ भी पहुँच गया!
‘ तुम मुझे ढूँढती हुई… मैं तुम्हारे पीछे …. ‘ रश्मि ने आँखें मूंद ली.
दो दिन की छुट्टी के बाद अक्षय कॉलेज गया तो प्रोफेसर देव कहीं दिखाई नहीं दिए. उनके ब्लॉक पर गया तो ताला लगा था.
सीता बाई ने बताया वे तो इस्तीफ़ा देकर चले गये.
” एक औरत आई थी. गौरी सी, अच्छी थी देखने में… पता नहीं रो रो कर मिन्नत कर रही थी. प्रोफेसर बोल रहे थे,, रश्मि मैं तुम्हारा बुरा सोच भी नहीं सकता. पर एक ही रट – मैं तुम्हारे हाथ जोड़ती हूँ मेरी ज़िंदगी से दूर चले जाओ.. राम जाने क्या कहानी है. बिस्तर बाँधा और निकल गये प्रोफेसर साब.”
अक्षय रात देर से घर आया. उसकी आँखें लाल थी.
” मम्मी मैं सोच भी नहीं सकता आप इतनी गिरी हुई हैं. आप तो जानती ही नहीं थी प्रोफेसर मोहित देव को? फिर मिलने गयी?”
रश्मि की आँखें नीची थी. ‘ एक औरत के मन की बात उसका बाप, उसका भाई उसका पति और उसका बेटा कोई भी नहीं समझ सकता.’
‘ तो इसलिए आप अपने मन की बात कहने के लिए प्रोफेसर मोहित देव के पास चली गयी.’
रश्मि ने देर तक अक्षय के चेहरे को घूरा और फिर बोली, ‘ हाँ मैं इसलिए उसके पास गयी.’
अक्षय की आँखों में नफ़रत बरस रही थी

तेरे बिन सूने ….

औरत उस अलौकिक संगीत की तरह है जो बजता है तो आनंदित करता ही है, मगर जब याद आता है तो फिर मन में बजने लगता है, और उतना ही आनंद देता है.
– माँ को ही देखो. जब थी तो गाँव में कहती थी, ” आज भरवाँ बैंगन बनाए हैं, अनुज को बहुत पसंद हैं.” और मुझे बंबई में सुनाई देता था. अब नहीं हैं तो लगता सब तरफ बस माँ ही है.
– माँ ही नहीं, प्रेमिका को लीजिए. कोई औरत एक बार आँखों में बस जाए तो जन्म भर एक ही तस्वीर दिखाई देती है .
– और बेटी… बस पूछिए मत. हर बाप को पता है. जब पास होती है, घर में चहकती रहती है, और जब दूर चली जाती है तो भी उसी की याद से घर महकता है.
मैं सोच ही रहा था कि आवाज़ आई, ” अब लॅपटॉप लेकर इस बीन बॅग में ही धन्से रहोगे! ११ बज गये. यह भी नहीं कि नहा कर बाथरूम को अच्छे से साफ कर दो.”
पत्नी जब डाँटती है तो आपका चेहरा नहीं देखती. पर उस दिन पंखा साफ करते उनकी नज़र मेरी आँखों की नमी पर पड़ गयी, जो अभी अभी गुज़रे ख्यालों की फुहार थी.
” क्या हुआ अब?” उनकी आवाज़ धँस सी गयी.
” कुछ नहीं जी, बस सोच रहा था आप नहीं होगी तो कैसे जी पाऊँगा.”
फिर बिगड़ गयी, ” बस मेरे मरने के ही ख्वाब देखते रहा करो. उम्र से पहले ही सठिया गये हो. उठो यहाँ से.”
मैं गुनगुनाता हुआ उठा, ” तेरे बिन सूने नयन हमारे..”
बाथरूम में जाने से पहले कोई ना कोई गाना होंठो पर आ ही जाता है.
मुझे पता है, वे बाहर से एक बार फिर झिड़क कर बोलेंगी, ” कुछ गाना आता तो पता नहीं क्या करते. जल्दी निकलो.”
बताइए क्या है ज़िंदगी…ऐसे साथी के बिना…एक शून्य… एक खला.

अनुराधा शर्मा सुपुत्री श्री ताराचंद शर्मा

अनु. पूरा नाम अनुराधा शर्मा सुपुत्री श्री ताराचंद शर्मा.
दो दिन पहले विकास के साथ भाग गयी. विकास का शर्मा जी के घर पर आना जाना था, मुहल्ला जानता है.
घर में सन्नाटा है. पड़ोस में घुसर फुसर है. गली में अटकलबाज़ियाँ हैं और गाँव में फैली हैं अफवाहें.
ताराचंद शर्मा ने घर में बैग रखते ही पहले पानी नहीं पिया, सन्नाटे को तोड़ा.
” मुझे कुछ मत बताइए, क्योंकि मुझे कुछ नहीं सुनना. मैं जानता हूँ मेरी लड़की के साथ कुछ बहुत ग़लत हुआ है.”
ज़रा रुके. फिर बोले, ” ऐसा प्यार वार कुछ नहीं होता है कि हाथों में पाली हुई लड़की एक दिन यूँ ही किसी के साथ भाग जाए.”
घर में सब चुप थे. बौखलाहट कम होगी तो कुछ बात की जाएगी.
शर्मा जी घर से बाहर आ गये. ज़ोर से पड़ोसियों को सुना कर बोले, ” मैं सब जानता हूँ, मेरी लड़की के साथ कुछ बुरा हुआ है.”
पड़ोसी हक्का बक्का थे. ” यह लो, अपनी औलाद को तो दोष नहीं देते. बुरा उसने किया है या उसके साथ हुआ है? दिमाग़ ही फिर गया है शर्मा का तो.”
शर्मा जी गली में आकर चिल्लाने लगे, ” कान खोल कर सुन लो, मुझे अच्छे से पता है कि मेरी लड़की के साथ कुछ बुरा हुआ है. और यही रपट लिखवाउँगा .”
गली में लोग एक दूसरे का मुँह देखने लगे.
” एक तो वैसे ही इज़्ज़त खराब हो गयी. अब यह ऊपर से और क्यों फ़ज़ीहत करवा रहा है.”
किसी ने कहा, ” बाप है भाई बाप है, बर्दाश्त नहीं हो रहा.”
शर्मा जी ने गाँव इकठ्ठा कर लिया. चबूतरे पर चढ़ गये. बस एक ही बात कि ‘ मेरी लड़की के साथ कुछ बुरा हुआ है. ऐसे ही नहीं भाग जाती कोई लड़की. पूरे देश को जवाब देना होगा’.”
तमाशा बन गया. अख़बार वाले आ गये. टीवी चैनल पहुँच गये.
इधर अनुराधा ने जयपुर स्टेशन के वेटिंग रूम में बैठे पापा को बेतहाशा न्यूज़ चॅनेल पर चिल्लाते देखा तो धक रह गयी.
सूखी और सूनी आँखें, और एक ही रट- ‘ मेरी बेटी के साथ कुछ बुरा हुआ है.”
अनुराधा ज़ोर ज़ोर से चिल्लाने लगी. सभी यात्री दंग और विकास की तो सिट्टी पिटी गुम.
१८-२० साल की लड़की एक ६ साल की बच्ची की तरह चीख चीख कर रो रही थी.
“मुझे पापा के पास जाना है. किसी को कुछ नहीं पता और सौ कोस बैठे मेरे पापा को सब पता है. मुझे पापा के पास जाना है.”
विकास ने हाथ लगाया तो झटक दिया. ” हाथ मत लगाओ मुझे. कोई प्यार वार नहीं है मुझे. और तुम भी क्या, बस नीची डाल का फल समझ कर तोड़ लाए हो. दूर हटो. सच पता लगेगा तो भाग निकलोगे.”
भाग निकली बस अड्डे की ओर. भीड़ हैरान थी.
” लगता है, पागल है? भाई अगर तू इसका घर जानता है तो ठीक से घर पहुँचा दे.”
विकास पीछे से आकर साथ चलने की कोशिश करता तो और आगे भाग लेती.
बस में आकर बैठ गये. अनु पापा का चेहरा याद कर के फफक फफक कर रो रही थी. हर आदमी से पूछ रही थी, ” यह बस नारनौल ही जाएगी ना?.”
विकास को नारनौल पहुँचने तक अपने प्यार को जीवित रखना था. जो कठिन था.
समय ना धीरे चल रहा था ना तेज़. अपनी रफ़्तार से- एक सेकेंड में सही एक सेकेंड.