तिहाड़ जेल के खास वॉर्ड से

मौसम सुहाना था और मेरे कदम खुद बखुद बढ़ रहे थे . मैं जनपथ से रेस कोर्स रोड की तरफ मुड़ गया.
इतने में मुझे एक फटी हुई जूतियों का जोड़ा पड़ा दिखा . एक जूती में अंगूठे के बाहर निकलने से छेद हुआ था और दूसरी एड़ी पर से छितरी हुई थी . मैं इन जूतियों को पहचानता था. थोड़ा और आगे गया तो एक पगड़ी पड़ी थी , मैली – कुचली पर ज्यों की त्यों बँधी हुई, जैसे सीधी सर से नीचे गिरी हो . मैं इस पगड़ी को भी पहचानता था. इस आदमी का नाम मातादीन था , और अभी कुछ दिन पहले इसने सूखे और ऋण से तंग आकर आत्म हत्या की थी. मगर इसकी जूतियां और पगड़ी यहां क्यों पड़ी थी? मेरा कुतूहल बढ़ा तो मैं थोड़ा और आगे गया.
आगे एक आदमी खड़ा था, सफ़ेद उजले कपड़ों में . उसके कपड़ों का उजलापन अभद्रता की हद से बाहर था . असहनीय था. ऊपर से उसके चहरे पर एक मुस्कराहट थी, बेशर्म सी, लापरवाह मुस्कराहट. मेरे पास कोई चारा नहीं बचा था. मैंने अपनी रिवाल्वर निकाली और छह की छह गोलियां उस के सीने में दाग दी. मैं जानता था मुझ पर हत्या का मुकदमा चलेगा , धारा ३०२ के तहत.
मैं कटघरे में खड़ा था . सरकारी वकील ने मुझसे पूछा , ” बाकी तो सब साफ़ है पर यह बताओ उस रात जब तुम घूमने निकले तो तुमने क्या सोच कर गोलियों से भरी रिवाल्वर अपने साथ ली थी. मेरे पास जवाब था. मैंने इत्मीनान से कहा , ” मीलोर्ड, उस रात मौसम बहुत ही खुशगवार था. ठंडी हवा चल रही थी. आसमान में पूरा चाँद खिला था , पूरी दिल्ली जिसकी चाँदनी में नहा कर दुल्हन सी लग रही थी. ऐसे में आप ही बताईये मीलोर्ड कि एक शरीफ आदमी अपनी रिवाल्वर , अगर उसके पास लाइसेन्स है तो , क्यों नहीं गोलियों से भर कर घर से निकलेगा . खास तौर पर जब वह बस यूँ ही घूमने जा रहा है.”
जज साब ने चकित होकर अपने चश्मे के ऊपर से मुझे देखा. मैं हँस दिया . मेरी हँसी में पागलपन था. फकत पागलपन .
मैंने सरकारी वकील की तरफ मुंह बिचका कर देखा और मन ही मन कहा , ” मेरे फ़ाज़िल दोस्त, मुझे कानून मत सिखाओ. मैं एक लेखक हूँ.”
मुझे पागल करार देकर तिहाड़ जेल के एक खास वॉर्ड में भेज दिया गया है. मेरा इलाज चल रहा है..

Advertisements

चार कौए

कभी-कभी जादू हो जाता है दुनिया में
दुनिया-भर के गुण दिखते हैं औगुनिया में

ये औगुनिए चार बड़े सरताज हो गए
इनके नौकर चील, गरूड़ और बाज हो गए।

हंस मोर चातक गौरैयें किस गिनती में
हाथ बाँधकर खड़े हो गए सब विनती में

हुक्म हुआ, चातक पंछी रट नहीं लगाएँ
पिऊ-पिऊ को छोड़ें कौए-कौए गाएँ।

बीस तरह के काम दे दिए गौरैयों को
खाना-पीना मौज उड़ाना छुटभैयों को

कौओं की ऐसी बन आयी पाँचों घी में
बड़े-बड़े मनसूबे आये उनके जी में

उड़ने तक के नियम बदल कर ऐसे ढाले
उड़ने वाले सिर्फ़ रह गए बैठे ठाले।

आगे क्या कुछ हुआ सुनाना बहुत कठिन है
यह दिन कवि का नहीं चार कौओं का दिन है

उत्सुकता जग जाए तो मेरे घर आ जाना
लंबा किस्सा थोड़े में किस तरह सुनाना!