भगवान है रे, पक्का है!

तुम बताओ यह ६ साल का बांद्रा स्टेशन पर फिरता लोटिया कौन है?
नहीं मालूम !

मैं बताता. इस अनाथ छोकरे को कालिया गनी किधर से उठा के लाया. उस का इरादा था इसके दोनों हाथ काटकर भीख माँगने को बिठाएगा. हाथ काटने को अंधेरे में रेलवे की पटरी पर लेकर गया तो कालिए को एक आइडिया आया. बोला, ‘ लोटिया देख, मेरे को तेरे दोनों हाथ काटना था, पर नहीं. आजकल साली पब्लिक ना बड़ी बेरहम हो गयी है. हाथ कटा बच्चा देख के मुँह फेर लेती रे. सुन ! तू यह हाथ रख. पर मेरे को रोज़ सौ रुपये ला के दे. भीख माँग… चोरी कर.. बर्तन धो. सब छूट. पर सौ रुपये ला के दे रोज़. जिस दिन नहीं तो फिर हाथ नहीं. ”
अब रोज़ लोटिया सौ रुपये ला के देता है. हाथ नचा के. खुश है. कालिया भी खुश है अपने आइडिया पर. बोलो, भगवान है के नहीं!
चलो छोड़ो. मुंगरी को ले लो. उत्तन की है. सड़क पर ताड़ गोला बेचती थी. १४ साल की हुई, कपड़े हुए के प्यार हो गया. ग़रीबी में प्यार तो फट से होता है,इसकी मा की.. बाजू के राजू लवनडे के साथ बंबई भाग आई. ये राजू कूतरी के ने खूब ‘प्यार’ किया उसको. जगह जगह ले जाके ‘प्यार’ किया. दिन भर भटकते. रात को ‘ प्यार’ करते. फिर एक दिन बोला, ” तू बैठ. मैं तेरे लिए पाव भाजी ले के आता.” भाग गया हरामी. पर भगवान तो है ना. एक गाड़ी वाला आया. सफेद पैंट, गॅंजी खोपड़ी. बोला, ‘ ए लड़की, बैठ गाड़ी में’. एक अच्छी सी जगह ले के गया. उसने भी वही किया जो राजू कुतरिया करता था. बस प्यार व्यार कुछ नहीं बोला. ५०० का नोट दिया. अब बोलो, भगवान है क्या नहीं!
और सुनो ! इधर ढाकन गाँव में २ बीघा ज़मीन है रामली की. अगर प्रधान बोलता कि कर काग़ज़ पर साइन तो क्या कर लेती. माँगता तो मरवा भी देता. पर नहीं. अच्छे से बोला, ‘ रामली तू कागज साइन कर दे और जब तक जीती है रोटी खाती रह.’
अब बोलो. है ना भगवान. पक्का है रे !

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शिक्षा ज़रूरी है

नीलिमा का टिफिन बनाते हुए मम्मी कह रही थी, ‘ अच्छे से खा लेना. आज पहला दिन है कॉलेज का…. और ठीक से रहना.’
आवाज़ में एक हल्की सी कंपकंपी थी. जो मन में था नहीं कह पा रही थी- ‘ कोई लड़का अगर छेड़खानी करे तो घबराना मत, घर पर आकर बता देना.’ फिर सोचा- ‘ यह भी कोई कहने की बात है. शी!’ मम्मी ने अपना सर झटका.

स्कूटी पर बैठी तो पापा बाहर निकले, ‘ स्कूटी संभाल कर चलाना, पहला दिन है…. और हाँ अच्छे से..’ पापा की आवाज़ में एक अजीब सी परेशानी थी, लगता है कुछ था अनकहा मन में- ‘कोई लड़का बदमाशी करे, तो डरना मत, बस आकर एक बार मुझे बता देना.’ मन में ही रख गये… क्यों ग़लत बात मुँह से निकाली सुबह सुबह.

शाम को नीलिमा लौटी तो घबराई हुई भी थी, और डरी हुई भी. मम्मी से नहीं रहा गया, आशंका कलेजा कुतर रही थी.

‘ठीक तो है ना बेटी. कॉलेज में कुछ हुआ तो नहीं ना!’

‘कॉलेज में क्या होगा मम्मी, बस थक गयी हूँ.’ नीलिमा ने चिढ़ कर कहा.

पापा पूछें तब तक वह अपने चेहरे से घबराहट और डर धो लेगी.

हुआ था कॉलेज में. जब भीड़ में तंग सीढ़ियों पर चढ़ रही थी तो एक हाथ सीधा उसकी छाती पर लगा. उसकी डर के मारे हल्की सी चीख निकल गयी थी .
गर्दन घुमाई तो एक लड़का जिसके गालों पर हँसी थी, और आँखें भेड़िए की तरह चमक रही थी, बोला, ‘ देख क्या रही है, माफ़ कर दे, ग़लती होगी.’

नीलिमा पूरे समय सिहरी रही, और लड़कियों के बीच दुबकी रही. टिफिन भी नहीं खाया. भरा टिफिन घर ले गयी तो प्रमाण बन जाएगा. रास्ते में कुत्तों को डाल दिया.
मम्मी के मन की घबराहट, पापा के दिमाग़ की परेशानी, और नीलिमा का डर अपनी अपनी जगह दुबक कर बैठे हैं.

वैसे सब ठीक ही है, जब तक कुछ बहुत अशुभ नहीं होता है.
शिक्षा ज़रूरी है. सबके लिए.