व्यस्त वृद्धा

मुझे कोई दस बरस ऐसे कस्बे में रहना पड़ा जहाँ बहुत कम लोग मुझे जानते थे. मेरे पढ़ने लिखने और ‘परम सत्य की खोज’ की धुन के लिए ये दस बरस बड़े मुफ़ीद थे. मैं सारा सारा वक़्त अपनी बालकनी में बैठा लिखता पढ़ता रहता. वहाँ से मैं देखता था एक बुढ़िया पूरे दिन अपने घर के पीछे अहाते में चिड़ियों को दाना देने, कपड़े तह करने, पौधे संभालने या कुछ भी करने में व्यस्त रहती थी. कभी खाली नहीं बैठती थी. मैं सोचता- ‘जीवन आख़िर मनुष्य को क्या बना देता है. बड़े बड़े सपने देखकर, भागमभाग करके आख़िर छोटे छोटे कामों में इंसान अपना मन ऐसे लगा लेता है जैसे इन्हीं कामों के लिए उसका जन्म हुआ था.’ जीवन की इस निस्सारता को देख मैं विचलित हो जाता और फिर तन्मयता से अपनी किताबों में सिर गाड़ देता.
कभी नीचे उतरता तो बुढ़िया को नमस्कार कर लेता था. मैं सोचता था अगर एक बार बातचीत कर ली तो फिर रोजाना बुढ़िया की राम कहानी सुननी पड़ेगी.
एक दिन मैं नमस्कार के बाद भी नज़र नहीं हटा पाया क्योंकि वह चिड़ियों को ऐसे दाने डाल रही थी जैसे कोई बच्चों के साथ खेलता है. जब उसने मेरी तरफ नज़र की तो उसकी आँखों मे इतनी आत्मीयता थी की मेरे होंठ अनायास खुल गये.
” अच्छा है अम्मा, आपका पूरे दिन ऐसे ही टाइम पास हो जाता है, वरना तो दिन काटना मुश्किल हो जाए.”
उसने कहा,” तुम भी तो अपना दिन किताबों के साथ काट देते हो.”
मैं किताबों में टाइम पास नहीं करता यह जताने के लिए मैंने कहा, ” मुझे बहुत कुछ जानना है अम्मा. मैं समझता हूँ कि हमारा जीवन इस जीव-जगत, इस ब्रह्मांड की रचना को समझने के लिए हुआ है. बाकी तो सब बस जीवन गुजराने के लिए है.”
बुढ़िया ने संयत स्वर में कहा,” पर तुम यह कैसे कह सकते हो कि उस सत्य को जानने का मार्ग केवल शब्द और किताबें हैं बेटा. सृष्टी की हर चीज़, हर घटना में भी तो वह सत्य छुपा है….” वह ज़रा रुकी फिर बोली, ” किसी महात्मा ने कहा है, दीया भी सूरज की रोशनी से ही जलता है.”
मैं अवाक खड़ा रहा गया. मेरे मुँह से बस ‘ यस’ निकला, धीमे से. मैं सोच रहा था अगर कोई स्टीफ़न हॉकिंग से भी पूछे तो वह यही कहेगा, ” ऑफ कोर्स, दि लाइट दैट कम्ज़ फ्रॉम ए लैम्प ऑल्सो बिलॉंग्स टू दि सन.”
किताबें मैं आज भी बहुत पढ़ता हूँ, पर उस दिन के बाद मैंने किसी भी छोटी से छोटी चीज़ या घटना को निरर्थक नही समझा.

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हम लुटेरे हैं.

वह बोलता जा रहा था. उसकी आँखों में एक अजीब सा आक्रोश था.
‘१९८४ में मैंने देखा. कैसे अचानक भीड़ का गुस्सा लूट की नीयत में बदल गया था. कैसे जल्दबाज़ी में घनश्याम तोतला एक ही पैर दो जूते उठा लाया था. अबकी बार किसी ने ऐसी ग़लती नहीं की. सबने इत्मीनान से लूटा. लूटने के लिए आग अनिवार्य है, बाहर भी और अंदर भी. …हम लुटेरे हैं.’
उसका आक्रोश बढ़ रहा था.
‘आंदोलन हमारे लिए लूटने की तमन्ना का उत्कर्ष है. प्यार भी हम इसीलिए करते हैं कि हमारी निगाहें लूट पर लगी रहती हैं.’
वह बोलता जा रहा था.
‘हम पेड़ों से फल लूट लेते हैं, पकने का भी इंतेज़ार नहीं करते. वरना कोई और लूट ले जाएगा. हम पौधों से उनके फूल लूट लेते हैं. फूलों में कुछ नहीं होता, बस वे हमें अच्छे लगते हैं. और जो कुछ भी हमें अच्छा लगता है, हम लूट लेते हैं. ‘
उसकी आवाज़ तेज़ हो रही थी.
‘हमने गायों से उनका दूध लूटा है. धरती से उसका धान लूटा है. हम धूप लूट सकते हैं.. हवा लूट सकते हैं.. हम दूसरों को को लूट सकते हैं.. खुद को लूट सकते हैं…..’
वह बेतहाशा होकर चुप हो गया. हंसा. फिर बोला.
‘डी जे, चलो म्यूज़िक बजाओ. हम लूटगान गाएँगे- “हम लुटेरे हैं.. हम लुटेरे हैं”‘