एक था बगुला, एक था कौआ

दिन में दस बार कौवे को देख कर बगुले का मन किरकिरा हो जाता था. पर क्या करता, पड़ोसी जो ठहरा.
हार कर एक दिन बोल ही दिया,” तेरी भी क्या किस्मत है यार, रात से भी ज़्यादा काला है.”
कौवे ने संयम से कहा, ” रंग से क्या होता है भई, गोरा हो या काला.”
सुनकर बगुले को तो आग सी लग गयी, बोला,” क्यों नहीं होता है? काले रंग को देखते ही मन उदास हो जाता है. अपशकुनी और मनहूसियत का रंग है काला रंग. सफेद रंग को देख कर मन को सुकून मिलता है. शांति और संयम का रंग है सफेद रंग.”
कौवा हँस कर बोला, ” अगर आप की बात सही है भगत जी, तो यह भी मान लो कि रंग चाहे मेरा बुरा है पर किस्मत तो आपकी ही खराब है.”
बेवकूफ़ बगुले को कुछ पल्ले नही पड़ा, चिड़चिड़ा कर बोला,” तुम से तो बात करना ही बेकार है, हमेशा लड़ाई के मूड में रहते हो.”

निरर्थकता

जब वह उदास होता तो दफ़्तर से सीधा बार में जाता था. देर तक शराब पीकर घर लौटता और अपनी कल्पना में किसी खूबसूरत औरत की बाहों में लिपटकर सो जाता था.
जब वह खुश होता तो भी दफ़्तर से सीधा बार में जाता था. देर तक शराब पीता, किसी वैश्या को लेकर होटेल में जाता और उसके शरीर से खेलकर सो जाता था.
जब वह दुखी होता त्तो भी दफ़्तर से सीधा बार में जाता था. देर तक शराब पीता और घर आकर पत्नी की गोद में सर छुपा कर खूब रोता और थक कर सो जाता था.
उस दिन वह ना उदास था, ना खुश था, ना दुखी था. फिर भी ना जाने क्यों दफ़्तर से सीधा बार में गया और खूब शराब पी.
ना उदासी, ना खुशी , ना दुख- बस निरर्थकता
थी, नितांत निरर्थकता. वह झेल नहीं पाया. सीधा स्टेशन गया और चलती गाड़ी के सामने अपने आपको फेंक दिया.
भीड़ चिल्लाई, ” क्या हुआ ! क्या हुआ !”
एक आवाज़ आई- ” कुछ नहीं भाई, बिना बात पी लेते हैं लोग, फिर होश रहता नहीं है.”

परत-दर-परत

राजकीय माध्यमिक पाठशाला मेहतावास के बच्चे छुट्टी होते ही जो हुड़दंग मचाते गाँव की ओर भागते हैं तो लगता है बड़े होकर ये सभ्यता को तहस नहस करेंगे. सबसे पीछे धीरे धीरे चलते, बतियाते आते हैं दीपू और पिंकी.
” इस से तो अच्छा है पापा मम्मी दोनों मर जाएँ .”
पिंकी चौंकती है, और धीरे से पूछती है, ” पर हम खाएँगे क्या फिर?”
दीपू ने जवाब पहले से सोच रखा है, ” स्कूल से छूटते ही कुंड के बस अड्डे पर जाएँगे, मैं गाऊँगा और तुम हाथ फैला कर साथ साथ चलना. देखना लोग बहुत पैसे देंगे.”
पिंकी आश्वस्त नहीं होती.
दहलीज पर बैठी बरफी अपनी कई दिनों बाद गाँव आई ननद से कह रही है, ” महेश के इन दोनों बच्चों को देख कितने सीधे हैं. माँ-बाप के पालन-पोषण का कितना फ़र्क होता है.”
घर पर गीता की आँख में आँसू अटका है, और गुस्से से तमतमा कर कहती है, “अगर ये बच्चे नहीं होते तो मैं एक दिन भी ओर तुम्हारे साथ नहीं रहती.”
महेश बिना उसकी ओर देखे, बेरूख़ी से जवाब देता है, ” मैं जानता हूँ. हर दूसरे दिन बताने की ज़रूरत नहीं है.”

जितने किरदार उतनी कहानियाँ

जमील भाई बता रहे थे.
सर, जैसे ही सद्दाम की फ़ौज़ कुवैत में घुसी, इंडियन दूतावास ने हमको बता दिया था कि अब जल्द से जल्द सब को यहाँ से निकल जाना चाहिए. बस तीन शिप और जाने वाले थे. मेरा और नासिर का कामकाज अच्छा चल रहा था, और इंडिया में आकर कुछ करने को भी नहीं था. मैं अकेला था सो पैर जमाए रखना चाहता था. नासिर की बीवी और फूल से दो बच्चे भी साथ थे. हमने ज़ुबैदा भाभी को लाख समझाया कि वह बच्चों को लेकर आगे चली जाए. हम जैसे हालात बनेंगे उसके हिसाब से फ़ैसला ले लेंगे, जल्दबाज़ी में पूरा काम चौपट करना ठीक नहीं था.
पर ज़ुबैदा भाभी एक सुनने को तैयार नहीं. ” इनके सिवा और कौन है मेरा. जीएँगे तो साथ जीएँगे, नहीं तो साथ मरेंगे. मैं इनको पीछे छोड़ कर बिल्कुल इंडिया नहीं जाऊंगी.”
हार कर हम सब आख़िरी जहाज़ अकबर से, जो कुछ समेट सके समेट कर, इंडिया के लिए रवाना हुए. नासिर को रोकने के चक्कर में मुझे भी घिसटते हुए आना पड़ा.
इंडिया आकर नासिर ने मिल्लत नगर में हमारे पड़ोस में दो कमरे का एक मकान ले लिया. और जंग ख़त्म होने का इंतेज़ार करने लगे.
देखो फिर क्या से क्या हुआ. ज़ुबैदा भाभी को दो तीन महीने बाद इंग्लिश सीखने का शोक चढ़ गया. बोली, कुवैत वापस गयी तो कोई नौकरी कर लूँगी. नासिर को भी तज्बीज पसंद आई. सामने ‘टीपू सुल्तान’ सीरियल का एक छोटा सा एक्टर रह रहा था, फ़िरोज़ कुछ नाम था, उस से इंग्लिश सीखने लगी.
इसके कोई पंद्रह दिन बाद नासिर भाई तड़के ६ बजे मेरा दरवाजा पीटने लगे. बौखलाए हुए थे, छूटते ही बोले, ” कोई बार खुली होगी क्या?” मैं बोला, ” इस समय? बोल ना क्या हुआ?”
नासिर भाई के होंठ नहीं खुल रहे थे. बड़ी हिम्मत करके बोले, ” ज़ुबैदा उस हरामजादे के साथ भाग गयी, दोनों बच्चों को छोड़ कर.”
अब बताओ साहेब इसको क्या कहेंगे? जमील भाई का अंदाज़ मुझे चित कर देने का था. चित मैं हो भी गया था, पर पैंतरा अभी था मेरे पास.
मैने कहा, ” जमील भाई यह तो हुई नासिर भाई की कहानी. अगर आप ज़ुबैदा से सुनेंगे तो यही कहानी कुछ और हो जाएगी, और फ़िरोज़ से सुनेंगे तो एक नयी कहानी बन जाएगी. सो जितने किरदार उतनी कहानियाँ…. अब यह बताओ आप की क्या कहानी है इसमें?”
जमील भाई मेरा मतलब समझ गये और झट से बोले, ” नहीं, नहीं अल्लाह कसम, इसमें अपनी कोई कहानी नहीं है.”

एक डरावनी कहानी

नानी कहानी सुनाने लगी.
राजा अपने राजकुमार बेटे से तो बहुत प्यार करता था. पर रानी पर दिन रात जुल्म करता था. राजकुमार को यह देख कर बहुत गुस्सा आता था, पर बेचारा क्या करता. बहुत छोटा था.
एक दिन आया कि राजकुमार जवान हो गया.
अचानक चिंटू घबरा कर बोला, “नहीं नानी नहीं. यह वाली कहानी नहीं. मुझे डर लगता है.”
“डर लगता है बेटा ?” नानी असमंजस में पड़ गई. “तो फिर कौनसी कहानी सुनाऊँ ?”
चिंटू उछल कर बोला, ” शेर वाली कहानी. जिसमें शेर दहाड़ता है, ज़ोर से. और जंगल के सब जानवर डर के मारे थरथर कांपने लगते हैं.”
शेर की कहानी शुरू की नानी ने, पर मन कहीं और उलझा था.

सुनयना भाभी

मेरे किशोर मन को लगा था जगन भैय्या को ही नहीं सुनयना भाभी ने मुझे भी धोखा दिया है. मन में उनके लिए नफरत भर आयी, और मैं फिर कभी भी उनके घर की तरफ़ नहीं गया.
एक समय था कि कॉलेज से लौटता तो उनको देखने के लिए आँखें तरसा करती. पुराने सिनेमा की नायिका सी, भरी भरी काया, चंचल आँखें और मतवाली चाल. रेडियो लगा कर काम में मग्न रहती, रोमांटिक गाना आया तो साथ साथ गुनगुनाती. महीना होने से पहले याद दिला देती, ” सत्तन बाबू, हमारी नूरी काजल याद करके ले आना.”
उनकी आंखों में अपनी लायी काजल देख कर अन्तरंगता का एहसास होता.
लंबे बालों का फैशन था, अकेली होती तो बाँह पकड़ के बिठा लेती, ” क्या यह सूखी लंबी ज़ुल्फों में हीरो बने फिरते हो, शादी से पहले ही गंजे हो जाओगे. लाओ थोड़ा तेल लगा दूँ.”
कभी प्रेमिका सी मनुहार तो कभी माँ सा दुलार. मैं बौराया रहता था.
जगन भैय्या महीने में बीस दिन टूर पर रहते थे. सीधे इंसान थे. सुनयना भाभी का दरवाज़ा सबके लिए खुला था.
एक दिन ओमी चाचा ने निकलते ही मुझे झप लिया, ‘ अबे हीरो, अभी तेरी मसें भी नहीं फूटी हैं. कई पाल रखे हैं इसने तेरे जैसे.”
मैं नीची गर्दन करके खिसक लिया. कान दिया तो ओमी चाचा की बात सही लगी . सुनयना भाभी , कहना नहीं बनता, मुझे वेश्या लगने लगी.
अब के बुआ आयी तो बेगाहे सुनयना भाभी का नाम निकल आया. बोली, ” क्या बताऊँ, पूरे जहान में भी ऐसी औरत नहीं मिलेगी. पति अपंग पड़ा है, कोढ़ सा निकला है कुछ. गन्दी बीमारी ले आया कोई. पर जो उसकी सेवा करती है, पूछो मत. और फिर पूरे गाँव की बूढी औरतों के, एक तेल आता है सांडू का, उससे जोड़ों पर मालिश करती है. सारा गाँव बड़ाई करते नहीं थकता. ”
35 बरस बाद सुनयना भाभी से मिलने की ललक मेरे मन में अचानक जाग आयी.
दो मिनट तो घूर कर देखती रही, फिर जो फफक कर रोयी, ” अरे सत्तन बाबू, किधर रास्ता भूले रे आज. अरे ऐसा क्या कर दिया था हमने. तुम तो उमर भर के लिए ही बिसरा दिए. देखो तो रे बबुआ, इन अंखियन ने फिर कभी काजल नही देखा रे. ”
उमड़ते ज्वार को रोकने के लिए मैं अपनी छाती मसलने लगा. फिर मेरे सर पर हाथ फेरती हुई बोली, ” मैं बोलती थी ना गंजे हो जाओगे.” और मुस्कुरा दी, जैसे बारिश होते धूप निकल आती है कभी कभी,
चाय पकौड़े के बाद सहज हुआ तो बोला, ” अब आता रहूंगा भाभी. कहो तो नूरी काजल लेता आऊ.”
संजीदा होकर बोली, ” नहीं रे सत्तन बाबू ,गए वो दिन. हाँ .. हो सके तो सांडू के तेल की एक दो शीशी ले आना. बहुत लगता है. ”
मुझे लगा मैं बहुत अदना हूँ.

दो दिन या एक रात

मंटू के पापा हर शनिवार चार बजे आ जाते थे. उस दिन उनका मूड बहुत अच्छा होता था. किसी भी बात पर उन्हे गुस्सा नहीं आता था. इतवार सुबह से उन पर भूत सवार हो जाता था. हर बात पर झगड़ा. कई बार तो मम्मी को एक दो तमाचे भी लगा देते थे. शाम होते गुस्से से भरा मुँह लिए, अपना बैग और टिफिन उठाकर एक हफ्ते के लिए चले जाते थे.
एक दिन सोमवार को स्कूल जाते हुए मंटू ने मम्मी से कह ही दिया, ‘ मम्मी, पापा से बोल दो, जो हफ्ते में दो दिन के लिए आते हैं, नहीं आया करें.’
मम्मी ने कहा, ‘ नहीं रे मंटू ऐसा नहीं बोलते. तुझे थोड़ा ही ना कुछ कहते हैं. बस एक रात के लिए तो आते हैं.”
मंटू समझता था पापा दो दिन के लिए आते हैं. पर मम्मी जानती थी कि मंटू के पापा बस एक रात के लिए आते हैं.