राम जी की गाय

जैसे ही प्रेयिंग मॅनटिस फ़ेसबुक आइडी से मित्रता का अनुरोध देखा मुझे अनायास राजबाला की याद आ गयी. जब आठवीं में थी तो किसी शरीर लड़के की खोपड़ी में विचार कौंधा, ‘देखो इस लड़की को- राम जी की गाय लगती है ना?’
राम जी की गाय अर्थात एकदम हड़ियल और ऊपर से बे-अनुपात डील-डौल. पतले पतले लंबे हाथ, सारस सी गर्दन पर छोटा सा सिर. समाधिस्थ सी आँखें जो देखने वाले को बिना देखे देख लेती हैं. कॉलेज में गयी तो बाइलोजी में टिड्डी पढ़ने वालों ने कहा– प्रेयिंग मॅनटिस.
यह राजबाला ही है तो हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी. दूसरे जिस नाम से तुम्हें चिढ़ाएँ, उसे अपनी पहचान बनाना, वह भी लड़की होकर! कलेजा चाहिए! ८४० बटे १००० की औसत में राम जी की गाय के पीछे लगने वाले भी होते हैं. पर यह कोई प्रेम-पिपासु नहीं था, बल्कि अपने आप को गर्व से वैश्यसुत कहने वाला गजिया था. मेरा रूम मेट, पूरा नाम गजेन्दर . मुझे लल्लू कह कर बुलाता था. बस उन्हीं दिनों लल्लू को शरीफ का पर्यायवाची माना जाने लगा था.
मगर जब फ़ेसबुक ने इत्तला दी कि यह प्रेयिंग मॅनटिस दिल्ली के बड़े होटल की मालिक है तो थोड़े संदेश आदान प्रदान किए. पता चला यह तो राजबाला ही है. वाह, राम जी की गाय, वाह! पुरानी यादें ताज़ा की, नंबर लिए दिए. और पिछली बार दिल्ली गया तो मिलने पहुँच गया महारानी बाग.
रास्ते में बीते दिन याद आ गये.
“देखो ल ल्लू! ये जो तितलियों के पीछे घूमते हैं, ये सब बेवकूफ़ हैं. हम यहाँ शादी करने नहीं आए हैं. मैने बहुत सोच समझ कर इस राम जी की गाय को चुना है. रोज़ टिफिन में कुछ खास होता है अपने लिए. ये देख, कल बटन टूट गया, यहीं यू पी टी में बैठ कर लगा दिया. ”
यू पी टी तथा यू ए न टी अर्थात अंडर पीपल ट्री और अंडर नीम ट्री ये दो खुले क्लास रूम थे, राजकीय महाविद्यालय नारनौल में.
“कौन नखरे झेले यार सुंदर लड़कियों के, और मिलना क्या है ? वक़्त खराब ! यहाँ सब कुछ मिल रहा है. लड़की को लग रहा है, यह कोई ऊपर वाले ने फरिश्ता भेजा है मेरे लिए. खुश है. कॉलेज हुआ तो इश्क़ हवा. समझे लल्लू!” उसने मुझे अपनी दिल की बात बताई, मुझे उसकी जात समझ में आई.
बड़ा सा फ्लॅट. नौकर ने दरवाज़ा खोला. खाली हाल के एक कोने में कराह रहे मरीज़ ने दो तीन बार मेरी और देखा. इतने में राजबाला आई. वैसी ही है, हड़ियल सी, मितभाषी.
“गजेन्दर हैज़ टर्मिनल इलनेस. मुझे ही सब कारोबार देखना पड़ता है.” इतना कह कर सोफे पर हाथ टिका कर बैठ गई, राम जी की गाय बनकर.
‘गजेन्दर तुम्हारा पति है? वही गजेन्दर..?’
कराह रहे मरीज़ के चेहरे मे मुझे अब गजेन्दर दिख गया था. मैं पास गया, ” हे गजिया, मैं लल्लू.”
उसने हाथ हिलाया. जैसे कह रहा था- वापस उन दिनों में जाने की हिम्मत नहीं है. तुम जाओ यार.
मुझे गजिया पर तरस आ गया. याद आया, कहीं पढ़ा था- मादा प्रेयिंग मॅनटिस धैर्य से अपने शिकार को पकड़ती है. और अपने कामसखा की तो जान ले लेती है.

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औरत

सम्पत चाचा गाँव का अपना एक कच्चे कोठे और छप्पर का घर, उसमें दुबक कर बैठा अपना ग़रीब परिवार, और अपने ताश के जोड़ीदार, सब छोड़ छाड़ कर एक दिन निकल गये. शादी की उम्र लाँघ चुके थे, बाकी तो गाँव में धूल थी. पहुँच गये सादुलपुर. कुछ दिन बाद सुनने में आया, वहाँ हलवाई की दुकान खोल ली है. गाँव में लड्डू बनाने में हलवाई का दायां हाथ होते थे, सो बात कुछ जॅंच सी गयी.
कई साल गुज़र गये. कच्चे कोठे और छप्पर के घर में ग़रीबी थी कि छाए जा रही थी. एक दिन वहीं से बात उठी कि संपत ने काम फैला लिया है. पैसे बरस रहें है.
कोठे और छप्पर के दिन बदलेंगे, सबको लगने लगा. सवाल उठा, ” भई क्या कर रहा है सम्पत नोटों का? बिछा के सो रहा है क्या?”
जवाब आया, वहीं से, कच्चे कोठे और छप्पर से- ” औरत.”
” सुन लो भई, औरत के चक्कर में फँस गया है सम्पत. ऐसा लपेट लिया है, वह कमा रहा है, और अगली राज कर रही है. इधर घर वाले मरो भूखे. क्या ज़माना आया है.”
बीस साल बीत गये. संपत चाचा सीहोर में मिसाल के तौर पर याद किए जाने लगे.
एक दिन लौट आए. सर पर हलवाई के दो तीन औज़ार रखे थे. साथ में एक दूर की बहन और उसका घरवाला था.
” बड़ी मुश्किल से समझा कर लाए हैं. वहाँ सादुलपुर में एक धर्मशाला में पड़ा था. बताओ ऐसे में मर जाए तो कोई फूँकने वाला भी नहीं मिले.”
“और जो दोनों हाथों से नोट समेट रहा था, क्या हुआ उस कमाई का?”
सम्पत चाचा तिनके से रेत पर कुछ लिखते रहे. मुँह बोली बहन ने मुँह बिचकाया. पर कच्चे कोठे और छप्पर ने फिर बात संभालने की कोशिश की.
” औरत, भई? क्या बचना था. सही तो कहती है दुनिया कि औरत ही बसाती है और वही आदमी को बर्बाद करती है.”
सम्पत चाचा ने बाकी ज़िंदगी बीड़ी फूँकने और पत्ते खेलने में काट दी. आज भी सम्पत का ज़िक्र चलता है तो औरत की बात निकल ही आती है.
औरत ही तो नहीं थी वरना संपत चाचा की ज़िंदगी भी रो धो कर ज़िंदगी सी तो होती.

एक था बगुला, एक था कौआ

दिन में दस बार कौवे को देख कर बगुले का मन किरकिरा हो जाता था. पर क्या करता, पड़ोसी जो ठहरा.
हार कर एक दिन बोल ही दिया,” तेरी भी क्या किस्मत है यार, रात से भी ज़्यादा काला है.”
कौवे ने संयम से कहा, ” रंग से क्या होता है भई, गोरा हो या काला.”
सुनकर बगुले को तो आग सी लग गयी, बोला,” क्यों नहीं होता है? काले रंग को देखते ही मन उदास हो जाता है. अपशकुनी और मनहूसियत का रंग है काला रंग. सफेद रंग को देख कर मन को सुकून मिलता है. शांति और संयम का रंग है सफेद रंग.”
कौवा हँस कर बोला, ” अगर आप की बात सही है भगत जी, तो यह भी मान लो कि रंग चाहे मेरा बुरा है पर किस्मत तो आपकी ही खराब है.”
बेवकूफ़ बगुले को कुछ पल्ले नही पड़ा, चिड़चिड़ा कर बोला,” तुम से तो बात करना ही बेकार है, हमेशा लड़ाई के मूड में रहते हो.”

निरर्थकता

जब वह उदास होता तो दफ़्तर से सीधा बार में जाता था. देर तक शराब पीकर घर लौटता और अपनी कल्पना में किसी खूबसूरत औरत की बाहों में लिपटकर सो जाता था.
जब वह खुश होता तो भी दफ़्तर से सीधा बार में जाता था. देर तक शराब पीता, किसी वैश्या को लेकर होटेल में जाता और उसके शरीर से खेलकर सो जाता था.
जब वह दुखी होता त्तो भी दफ़्तर से सीधा बार में जाता था. देर तक शराब पीता और घर आकर पत्नी की गोद में सर छुपा कर खूब रोता और थक कर सो जाता था.
उस दिन वह ना उदास था, ना खुश था, ना दुखी था. फिर भी ना जाने क्यों दफ़्तर से सीधा बार में गया और खूब शराब पी.
ना उदासी, ना खुशी , ना दुख- बस निरर्थकता
थी, नितांत निरर्थकता. वह झेल नहीं पाया. सीधा स्टेशन गया और चलती गाड़ी के सामने अपने आपको फेंक दिया.
भीड़ चिल्लाई, ” क्या हुआ ! क्या हुआ !”
एक आवाज़ आई- ” कुछ नहीं भाई, बिना बात पी लेते हैं लोग, फिर होश रहता नहीं है.”

परत-दर-परत

राजकीय माध्यमिक पाठशाला मेहतावास के बच्चे छुट्टी होते ही जो हुड़दंग मचाते गाँव की ओर भागते हैं तो लगता है बड़े होकर ये सभ्यता को तहस नहस करेंगे. सबसे पीछे धीरे धीरे चलते, बतियाते आते हैं दीपू और पिंकी.
” इस से तो अच्छा है पापा मम्मी दोनों मर जाएँ .”
पिंकी चौंकती है, और धीरे से पूछती है, ” पर हम खाएँगे क्या फिर?”
दीपू ने जवाब पहले से सोच रखा है, ” स्कूल से छूटते ही कुंड के बस अड्डे पर जाएँगे, मैं गाऊँगा और तुम हाथ फैला कर साथ साथ चलना. देखना लोग बहुत पैसे देंगे.”
पिंकी आश्वस्त नहीं होती.
दहलीज पर बैठी बरफी अपनी कई दिनों बाद गाँव आई ननद से कह रही है, ” महेश के इन दोनों बच्चों को देख कितने सीधे हैं. माँ-बाप के पालन-पोषण का कितना फ़र्क होता है.”
घर पर गीता की आँख में आँसू अटका है, और गुस्से से तमतमा कर कहती है, “अगर ये बच्चे नहीं होते तो मैं एक दिन भी ओर तुम्हारे साथ नहीं रहती.”
महेश बिना उसकी ओर देखे, बेरूख़ी से जवाब देता है, ” मैं जानता हूँ. हर दूसरे दिन बताने की ज़रूरत नहीं है.”

जितने किरदार उतनी कहानियाँ

जमील भाई बता रहे थे.
सर, जैसे ही सद्दाम की फ़ौज़ कुवैत में घुसी, इंडियन दूतावास ने हमको बता दिया था कि अब जल्द से जल्द सब को यहाँ से निकल जाना चाहिए. बस तीन शिप और जाने वाले थे. मेरा और नासिर का कामकाज अच्छा चल रहा था, और इंडिया में आकर कुछ करने को भी नहीं था. मैं अकेला था सो पैर जमाए रखना चाहता था. नासिर की बीवी और फूल से दो बच्चे भी साथ थे. हमने ज़ुबैदा भाभी को लाख समझाया कि वह बच्चों को लेकर आगे चली जाए. हम जैसे हालात बनेंगे उसके हिसाब से फ़ैसला ले लेंगे, जल्दबाज़ी में पूरा काम चौपट करना ठीक नहीं था.
पर ज़ुबैदा भाभी एक सुनने को तैयार नहीं. ” इनके सिवा और कौन है मेरा. जीएँगे तो साथ जीएँगे, नहीं तो साथ मरेंगे. मैं इनको पीछे छोड़ कर बिल्कुल इंडिया नहीं जाऊंगी.”
हार कर हम सब आख़िरी जहाज़ अकबर से, जो कुछ समेट सके समेट कर, इंडिया के लिए रवाना हुए. नासिर को रोकने के चक्कर में मुझे भी घिसटते हुए आना पड़ा.
इंडिया आकर नासिर ने मिल्लत नगर में हमारे पड़ोस में दो कमरे का एक मकान ले लिया. और जंग ख़त्म होने का इंतेज़ार करने लगे.
देखो फिर क्या से क्या हुआ. ज़ुबैदा भाभी को दो तीन महीने बाद इंग्लिश सीखने का शोक चढ़ गया. बोली, कुवैत वापस गयी तो कोई नौकरी कर लूँगी. नासिर को भी तज्बीज पसंद आई. सामने ‘टीपू सुल्तान’ सीरियल का एक छोटा सा एक्टर रह रहा था, फ़िरोज़ कुछ नाम था, उस से इंग्लिश सीखने लगी.
इसके कोई पंद्रह दिन बाद नासिर भाई तड़के ६ बजे मेरा दरवाजा पीटने लगे. बौखलाए हुए थे, छूटते ही बोले, ” कोई बार खुली होगी क्या?” मैं बोला, ” इस समय? बोल ना क्या हुआ?”
नासिर भाई के होंठ नहीं खुल रहे थे. बड़ी हिम्मत करके बोले, ” ज़ुबैदा उस हरामजादे के साथ भाग गयी, दोनों बच्चों को छोड़ कर.”
अब बताओ साहेब इसको क्या कहेंगे? जमील भाई का अंदाज़ मुझे चित कर देने का था. चित मैं हो भी गया था, पर पैंतरा अभी था मेरे पास.
मैने कहा, ” जमील भाई यह तो हुई नासिर भाई की कहानी. अगर आप ज़ुबैदा से सुनेंगे तो यही कहानी कुछ और हो जाएगी, और फ़िरोज़ से सुनेंगे तो एक नयी कहानी बन जाएगी. सो जितने किरदार उतनी कहानियाँ…. अब यह बताओ आप की क्या कहानी है इसमें?”
जमील भाई मेरा मतलब समझ गये और झट से बोले, ” नहीं, नहीं अल्लाह कसम, इसमें अपनी कोई कहानी नहीं है.”

एक डरावनी कहानी

नानी कहानी सुनाने लगी.
राजा अपने राजकुमार बेटे से तो बहुत प्यार करता था. पर रानी पर दिन रात जुल्म करता था. राजकुमार को यह देख कर बहुत गुस्सा आता था, पर बेचारा क्या करता. बहुत छोटा था.
एक दिन आया कि राजकुमार जवान हो गया.
अचानक चिंटू घबरा कर बोला, “नहीं नानी नहीं. यह वाली कहानी नहीं. मुझे डर लगता है.”
“डर लगता है बेटा ?” नानी असमंजस में पड़ गई. “तो फिर कौनसी कहानी सुनाऊँ ?”
चिंटू उछल कर बोला, ” शेर वाली कहानी. जिसमें शेर दहाड़ता है, ज़ोर से. और जंगल के सब जानवर डर के मारे थरथर कांपने लगते हैं.”
शेर की कहानी शुरू की नानी ने, पर मन कहीं और उलझा था.