शीशे के घर में फूलों की क्यारी

बंसी मामा ने बस से उतरते ही अपने धवल लिबास की सिकुड़न ठीक की. कोई सामान नहीं, हाथ में गोल किए हुए दो तीन अख़बार थे बस .
पैर छुए तो मेरे कंधे पर हाथ रखते ही बोले, ‘ प्रमोद ! देखो…अरे तुम तो बड़े वाले हो ना? क्या नाम है ..मनीष!’
बड़ा आदमी होने का पहला लक्षण है सगे भतीजे भानज़ों का नाम भूल जाना.
‘क्या है इस चौधरी ने तुम्हारे इलाक़े में कुछ काम नहीं किया.’
चौधरी से उनका मतलब था मुख्यमंत्री चौधरी हुकम सिंग.
‘तुम लोगों का एम एल ए यह देशराज भी राव बना फिरता है, पर निक्कमा है.’
मेरे भीतर माँ के गर्व भरे शब्द गूँज रहे थे,’ मेरा बंसी भाई बड़े बड़े लोगों में बैठता है.’ और यह बंसी मामा तो लग रह है खाली हाथ जा खड़े होंगे. मुझे माँ का उतरा हुआ चेहरा दिखा.
‘यह सीहोर तक जाने की क्या व्यवस्था है भाई?’
मैने कहा मेरी साइकल पे करियर है वैसे तो और गाँव से एक ऊंटगाड़ी भी आई हुए है, आप बताइए.
बंसी मामा ने साइकल, ऊंटगाड़ी और अनुपस्थित कार में से ऊंटगाड़ी को चुना.
मैने साइकल जे पी के यहाँ खड़ी की, और जेब पर भारी होते हुए भी लगे हाथ दो किलो बरफी ले आया.
बंसी मामा पूरे रास्ते ऊँट गाड़ी में बैठे सब लोगों की क्लास लेते रहे. सब सुग्रीव की बंदर सेना की तरह उनका मुँह ताकते रहे,
माँ हाथ में दो किलो बरफी पकड़ते ही खुशी से लद गयी. ” अरे बंसी भैया इतनी सारी मिठाई!’ मामा ने कोई ध्यान नहीं दिया.
रात को कई घरों से दूध आया. लोग बंसी मामा को अपनी अपनी फरियाद सुना रहे थे. माँ के पैर धरती पर नहीं टिक रहे थे.
सोने लगे तो माँ ने कान में डाल दिया, ‘ एक एक रुपया दिया करता है, पर अब के मेरी जेठानी का भाई सबको ५-५ दे के गया है. खुल्ले नहीं हो तो ले लेना.’
सुबह चलने लगे तो बंसी मामा ने ज़ोर से मुझ से कहा, ‘ जा रे मनीष वो सौ के खुल्ले ला, जल्दी से.’
कोई शक़ की गुंजाइश ही नहीं थी कि बंसी मामा के सौ बँधे मेरे पास नहीं पड़े हैं.
‘ताई, बुआ, सब को दस दस.. बच्चो को पाँच पाँच. बाकी अपनी जेब में डाल लिए. अगली बार मिलेंगे तो धमकाएँगे मुझे,’ बे नालायक वे सौ रुपये तो माँग कर ले लेता.’ पर देंगे नहीं. कुछ भी हो इस सारे आडंबर और झूठ के बीच बस एक चीज़ सच्ची थी- माँ की आँखों से छलकती खुशी. जैसे शीशे के घर में फूलों की क्यारी .

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