अच्छा परिवार

एक छोटी सी झुग्गी है. झाँक कर देख लीजिए. अंधेरा है पर जैसे ही पुतलियाँ थोड़ी बड़ी होंगी, सब दिख जाएगा. एक टूटा हुआ पुराना सा सोफा कम बेड. जिस पर गंदा सा कपड़ा ढका है. एक कुर्सी है, एक हाथ की. कोने में कुछ बिस्तर पड़े हैं. एक चटाई खड़ी है. किचन भी है. बस कमरे में ही एक ईंट की छोटी सी आड़ बना दी है. उस तरफ की तीन फुट की जगह किचन है. यह जो प्लास्टिक का परदा टंगा है, यह दो फुट का एरिया बाथ रूम है.
सीलन भी है और एक गंध भी. यह गंध कई चीज़ों की गंध मिलकर सालों में बनती है.
औरत को अभी अभी पीट कर आदमी बाहर गया है. अच्छा आदमी है. जब ग़लत कुछ करता है तो दारू का सहारा लेना पड़ता है. लड़की कुछ दिन से गड़बड़ कर रही थी. पता नहीं कहाँ से पैसे ला रही थी. अब पूरा खुलासा क्या करना. कल से नहीं आई है. लगता है भाग गयी. लड़का एक महीने से जेल में हैं. कुछ काला कांडी करता था. वैसे अच्छे बच्चे हैं दोनों.
ये सब अच्छे लोग हैं. वरना हो सकता है आदमी ने औरत को काट डाला होता या औरत ने बाजू वाले आदमी से मिलकर अपने आदमी को मरवा दिया होता. लड़की खुले आम अपने आपको बेच रही होती. लड़के ने बाप का ही खून कर दिया होता. पर नहीं, ये लोग क्रिमिनल नहीं हैं.
क्या है कि इनको हवा, पानी और रोशनी नहीं मिल रही. और जब आदमी को साँस लेने के लिए कम हवा मिले, पीने और नहाने के लिए कम पानी मिले, और इतनी कम रोशनी मिले कि कभी ढंग से अपना चेहरा भी नहीं देख पाए तो वह ऐसा ही होता है. मर भी सकता, मार भी सकता है. कुछ भी कर सकता है. अगर विश्वास नहीं हैं तो ज़रूरत से कम हवा, पानी और रोशनी में रह कर देख लीजिए.
कल इनमें से कोई एक संगीन गुनाह में पकड़ा जाता है तो आरोपी में सरकार का नाम भी लिखा जाना चाहिए. मैंने बहुत बार सुना है सबको हवा, पानी और रोशनी सरकार ही मुहैया करवाती है.

Advertisements

भगवान है रे, पक्का है!

तुम बताओ यह ६ साल का बांद्रा स्टेशन पर फिरता लोटिया कौन है?
नहीं मालूम !

मैं बताता. इस अनाथ छोकरे को कालिया गनी किधर से उठा के लाया. उस का इरादा था इसके दोनों हाथ काटकर भीख माँगने को बिठाएगा. हाथ काटने को अंधेरे में रेलवे की पटरी पर लेकर गया तो कालिए को एक आइडिया आया. बोला, ‘ लोटिया देख, मेरे को तेरे दोनों हाथ काटना था, पर नहीं. आजकल साली पब्लिक ना बड़ी बेरहम हो गयी है. हाथ कटा बच्चा देख के मुँह फेर लेती रे. सुन ! तू यह हाथ रख. पर मेरे को रोज़ सौ रुपये ला के दे. भीख माँग… चोरी कर.. बर्तन धो. सब छूट. पर सौ रुपये ला के दे रोज़. जिस दिन नहीं तो फिर हाथ नहीं. ”
अब रोज़ लोटिया सौ रुपये ला के देता है. हाथ नचा के. खुश है. कालिया भी खुश है अपने आइडिया पर. बोलो, भगवान है के नहीं!
चलो छोड़ो. मुंगरी को ले लो. उत्तन की है. सड़क पर ताड़ गोला बेचती थी. १४ साल की हुई, कपड़े हुए के प्यार हो गया. ग़रीबी में प्यार तो फट से होता है,इसकी मा की.. बाजू के राजू लवनडे के साथ बंबई भाग आई. ये राजू कूतरी के ने खूब ‘प्यार’ किया उसको. जगह जगह ले जाके ‘प्यार’ किया. दिन भर भटकते. रात को ‘ प्यार’ करते. फिर एक दिन बोला, ” तू बैठ. मैं तेरे लिए पाव भाजी ले के आता.” भाग गया हरामी. पर भगवान तो है ना. एक गाड़ी वाला आया. सफेद पैंट, गॅंजी खोपड़ी. बोला, ‘ ए लड़की, बैठ गाड़ी में’. एक अच्छी सी जगह ले के गया. उसने भी वही किया जो राजू कुतरिया करता था. बस प्यार व्यार कुछ नहीं बोला. ५०० का नोट दिया. अब बोलो, भगवान है क्या नहीं!
और सुनो ! इधर ढाकन गाँव में २ बीघा ज़मीन है रामली की. अगर प्रधान बोलता कि कर काग़ज़ पर साइन तो क्या कर लेती. माँगता तो मरवा भी देता. पर नहीं. अच्छे से बोला, ‘ रामली तू कागज साइन कर दे और जब तक जीती है रोटी खाती रह.’
अब बोलो. है ना भगवान. पक्का है रे !

भूख, बेचारगी, और सोच

जब उसने कहा’ बहुत भूख लगी है’ उसके चेहरे पर खुशी बिखरी थी. भूख रईस की यदा कदा मिलने वाली प्रेमिका होती है.
मैं ‘कुछ भी मंगवा लीजिए’ कहकर उसके चेहरे पर मुझे ‘ बेचारा’ कहने वाली सुपरिचित मुस्कुराहट नहीं देखना चाहता था.
मैं भी मेनू पलटने लगा. फाइन डाइनिंग, अर्थात हर डिश १००० से ऊपर. प्राइस पढ़ने की आदत नहीं छोड़ पाया हूँ मैं. पसंद से नहीं कीमत से चुनते हुए यहाँ तक आया हूँ. बिल वही देगा यह निश्चित है, लेकिन एक वक़्त की भूख मिटाने के लिए ५ हज़ार खर्च करने का अपराध-बोध पूर्णतया मेरा होगा.
हर डिश को वह ऐसे बताता है जैसे वह मुँह तक पहुँचने से पहले टेबल पर आकर मुज़रा करेगी. मैं हाँ हूँ करता रहूँगा. वह जानता है मेरे जैसे बहुत से लोग हैं जो ‘ वैष्णव भोजनालय’ और रेहडी वाले की अंडा भूर्जी खाकर कॉर्पोरेट बोर्ड रूम्स तक पहुँच गये हैं. उनकी बेचारगी उनके व्यक्तित्व पर अंकित रहती है, एक बड़े से मस्से की तरह.
उसे ज़रा सा भी भान नहीं है कि उसके सामने बैठा उसका संभ्रांत सा दिखता कुलीग अचानक टेबल नाइफ से उसका गला काटने की सोच सकता है. मैं जानता हूँ मैं उसका गला नहीं काटने वाला. मैं सोच रहा हूँ, बस सोच रहा हूँ. उसकी हाँ में हाँ मिलाते हुए.

पता नहीं

पता नहीं, पर जब भी रेलवे स्टेशन पर घिसटते फिरते अपंगो को देखता हूँ तो लगता है कि ये यहीं पैदा होते हैं, यहीं अपाहिज बनते हैं, और यहीं मर जाते हैं.
पता नहीं, यह भी हो सकता है कि जिनके भी हाथ पैर कट जाते हैं, उनके लिए रेलवे स्टेशन ही काशी काबा होते हैं.
कुछ लोगों का तो यह भी कहना है कि कुछ अपराधिया गिरोह हैं जो इनके हाथ पैर काट कर भीख माँगने के लिए इन्हे यहाँ छोड़ देते हैं. पता नहीं.
अभी पिछले बार जब मैं पत्नी के साथ दिल्ली जा रहा था तो एक पैर कटे लड़के को देख मुँह से निकल गया, “ये इतने अपंग कहाँ से आते हैं ?”
पत्नी ने मुँह सिकोड़ कर कहा, “पता नहीं ,पर देख कर जी खराब हो जाता है.”
भीख देते समय मेरा हाथ आगे पीछे होने लगता है पर उस दिन मैंने दस का नोट निकाला और इशारे से उस लड़के को बुलाया. वह झट घिसटता हुआ हमारी तरफ आया.
जैसे ही नोट मुट्ठी में भींचकर वापस सरपट जाने लगा तो मैंने रोक कर पूछा, ” रुको ज़रा, यह तो बताओ तुम्हारे ये दोनों पैर कैसे कट गए ?”
उसने भेदिया नजरों से मेरी तरफ घूरा, और बोला, “पता नहीं.”

एक्सट्रा काम

राजीव ने दरवाज़ा खोला तो जानाबाई ढलता सूरज देखती फर्श पर बैठी थी.
” अरे जाना तुम घर नहीं गयी अभी तक.”
” आप ही की बाट देख रही थी साब. आपने कल एस्ट्रा काम के लिए सौ रुपये अलग से दिए थे ना.” राजीव सुनकर सोच में पड़ गया
.” पर थोड़ा जल्दी करो साब. घर पर लड़की अकेली है.”
राजीव को समझ में नहीं आया क्या जवाब दे. उसने हड़बड़ी में कहा,” तुम अब जाओ. लड़की को भी साथ ले आया करो, तुम्हारे पीछे से पूरा दिन अकेली रहती होगी.”
जाना पूरी रात राजीव की बात के अच्छे बुरे मतलब सोचती रही.