सौगंधी कल मर गयी

आप-पास वालियों ने नहला के तैयार तो कर दिया है, पर श्मशान तो चार आदमी ही उठा कर ले जाएँगे ना.
आधी उम्र तो शरीर को भरने और ढकने के लिए शरीर को ही बेचा, और फिर ढल गया तो बाजू वालियों का चौका बर्तन किया, कपड़े लत्ते धोए, फिर शरीर को भरने ढकने के लिए ही. बाकी ना कोई मतलब और ना कोई मकसद. क्या कहेंगे इस को अर्थशास्त्र में? छोड़ो अर्थशास्त्र को, समाजशास्त्र में ही बताओ क्या कहेंगे- तन को बेच कर तन को भरने ढकने की इस नीति को, नियति को?
मंटो ने बताया था सौगंधी के बारे में, जब वह जवान थी. दारोगा से लेकर, कपड़ा व्यापारी तक उसकी किराए की खोली में आते जाते थे.
उधर जब भी गया, सीधा रास्ता छोड़ कर मैं भी उसकी गली से ही गुज़रा , पर खोली में जाने की कभी हिम्मत नहीं हुई. इज़्ज़तदार आदमी हूँ.
चार आदमी भी मिल जाएँगे. एक तो यह बांडिया रहा, कल तो पी के पड़ा था पर सुबह सुबह तो काम आ ही जाएगा. एक कालिया तो है ही. कमीना है पर लाश तो उठवा ही देगा. दो कोई और पकड़ लाएँगे. इनमे से कोई भी कभी सौगंधी का ग्राहक नहीं रहा.
एक तन लाई थी, तन ले गयी. किसा ख़त्म, पैसा हजम.

कृपया ध्यान दें: यदि सौगंधी की मौत पर आप को अपनी संभ्रांत संवेदना व्यक्त करनी है तो अपने ही पेज पर करें या कहीं और. मैं एक इज़्ज़तदार आदमी हूँ और मेरे बच्चे भी अब बड़े हो गये हैं.

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पमिया पेरणी की ‘स्टोरी’

मुझे अपने अख़बार के लिए ‘पेरणीयों में देह व्यापार’ पर ‘स्टोरी’ करनी थी.
एक कामरोगी से परिचित ने – हर दो मिनिट के बाद जिसकी टॅगलाइन होती थी ‘ हम तो ठहरे जी अय्याश’- मुझे पमिया पेरणी के झोंपडे तक पहुँचने का रास्ता दिखाया. यह जो दिल्ली से सोनीपत के रास्ते पर नये सस्ते घर बन रहे हैं, क्या नाम इसका? याद आया, बवाना; बवाना से बाहर निकलते ही.
झुक कर अंधेरे से झोंपडे में घुसा तो पमिया एक चमकदार सस्ता सा ब्लाऊज ठीक कर रही थी, और एक ६-७ साल का लड़का जिसकी पीठ नंगे रहने से ज़्यादा ही काली हो गयी थी, एक ४ साल की आधी सुथरी आधी मैली लड़की के साथ बैठा पढ़ाई जैसा कुछ कर रहा था.
मुझे देखते ही पमिया बोली, ” तावली से पूछ, काम पे जावां फेर.”
” ये बच्चे … थोड़ी देर बाहर …” मैं सकपकाया.
” पर थे तो खाली सवाल पूछन आया हो ना. घर पे तो मैं हाथ भी नहीं लगान दूं.”
” नहीं, सवाल ही पूछने हैं ,वैसे तो.”
मैं झिझकता सा शुरू हुआ और घूम फिर कर मुद्दे की बात पर आया.
” पर तुमको लगता तो होगा ना कि तुम वैश्यावृति करती हो?”
” कसी बेश्याबरती, मेंह तो अपनों र ताबरियाँ को पेट भराँ. बेश्या तो वे मर्द होवी जो पैसा देकर म्हारे साथ ग़लत काम करीं.”
“पर पेट के लिए तुम कुछ और काम भी तो कर सकती हो?”
” बताओ म्हाने कोई आदमी जो और काम के लिए २० मिंट में सौ का नोट निकाले? दस भी ना दे कोई.”
इतने में पमिया का घर वाला आ गया. उसने ठेठ अपनी बोली में पमिया से कुछ कहा जिसका मतलब था- कौन लाट साब है यह, बिना बात टाइम खराब मत करना. कम से कम दो सौ लेना.
वह चला गया तो पमिया बोली, ” २० रुपए दारू के लिए मरे आज. यो ही मर्द थो , मेरे हाथ लगा लियो तो सिर फोड़ दियो थो.”
मैं चलने लगा तो मैने ५०० का नोट निकाल कर पमिया को थमाया.
” ५०० कईं बात का. साथ चालूं के?”
“नहीं, नहीं”, मैं बोला, “ज़रा इधर खड़ी हो तो. बच्चो तुम भी ज़रा इधर देखो.” मैं अपना मोबाइल निकाल कर फोटो लेने लगा.
पमिया ने ५०० का नोट अपने खिस्से से वापस निकाला और मेरे ऊपर फेंक दिया.
” ये अपनी रकम पकड़ और रस्ता पकड़. आया मेरी र बालकां की फोटू निकालन आला.