प्यार से इतर,कुछ और

है कुछ प्यार से इतर, प्यार से भी शायद आगे. जिस तक हम नहीं पहुँच पाए. ठहर गये प्यार पर ही- ओत-प्रोत होकर, स्तब्ध होकर, या फिर बौखला कर .

१९७१ की ग्रीष्म ऋतु. बस दो बार आँख मिली थी. जब नर्मदा बुआ उसे ओक से पानी पिला रही थी. धार टूटी तो उसने ऊपर देखा. आँखे मिली तो बुआ ने झट से वापस धार बाँधी. फिर बुआ की नज़र धार से हटकर उस के चेहरे पर भटकी और फिर धार टूटी और फिर आँखें मिली, बस.

उसके बाद जब एक ओर से पलकें उठी दूसरी ओर से झुक गयी.
फिर दोनों का विवाह हो गया. उसका नांगल की रामकली से और बुआ का माजरे के रामप्रसाद से जो घरजमाई बन कर सीहोर आ गये. रामप्रसाद फूफा जी तीस साल सीहोर में रह कर भी प्रवासी से ही लगते रहे .

वह इंतज़ार करता था कि नर्मदा बुआ का कोई काम निकले तो जी जान लगा दे. प्यार नहीं था यह. कुछ और था.

एक दिन बुआ के ससुराल गोंद के लड्डू पहुँचा कर मोटर साइकल से लौट रहा था कि दुर्घटना में चल बसा. रामकली उस दिन से बुआ को दिन रात गालियाँ देती है. नाम नहीं लेती बुआ को रांड़ कहती है. बुआ बुरा नहीं मानती. मगर रामकली को जब भी कुछ चाहिए बुआ के पास आ धमकती है. बुआ को चाहे भूखा सोना पड़े पर रामकली को खाली हाथ नहीं लौटाती.

२००१ की शीत ऋतु..नये शॉल और स्वेटर के लिए १५०० रुपये बचा रखे थे बुआ ने. कई दिन से मुझ से कह रही थी अब के रेवाडी जाए तो ला के देना. एक दिन गया तो रामकली बुदबुदाती निकल रही थी, ‘ रांड़ कहीं की! देगी नहीं तो क्या करेगी!’
मैने पूछा तो बुआ ने टाल दिया , ‘ अरे बेटा, संदूक खोली तो शॉल और स्वेटर तो पिछले वाले ही नये के नये रखे हैं. सोचती हूँ क्यों खर्चा किया बिना बात.’
हमारे प्रवासी फूफा ही क्या पूरी दुनिया ही इस क़िस्से से अनजान हैं.
क्योंकि यह प्यार नहीं है , कुछ और है . .

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आराधना

‘ तुमने हमारी पहली रात एक बहुत ही तुच्छ सा सवाल किया था मुझ से…. ‘तुमने किसी से पहले प्यार किया है क्या?’ जवाब में मैने चुप्पी साध ली थी. एक बहुत लंबी चुप्पी. नौ साल लंबी हो गयी है मेरी खामोशी. आज जवाब देने का दिन आया है.’
बेखुदी में जया के कुछ आँसू गालों पर ही सूख गये थे, कुछ अभी भी बह रहे थे. उसने सबको समेटा और अपने आपको संयत किया.
‘आज तुम कह रहे हो तुम्हें किसी से प्यार हो गया है, और हमें अलग हो जाना चाहिए… तो सुनो! कोई था जो मुझ से बहुत प्यार करता था. मुझे उसके प्यार में कोई खोट नहीं दिखा पर फिर भी मैने अस्वीकार कर दिया था. तुम्हारा पुरुष का छिछला मन मेरे कारण को नहीं समझ पाएगा, इसीलिए मैने चुप्पी साध ली थी. पता नहीं मेरी चुप्पी का क्या मतलब निकाला होगा…’
‘नहीं मैने कभी तुम पर कोई शक़ …’ , अनिरूद्ध ने बीच में बात काट दी.
‘मैं नौ साल चुप रहीं हूँ… आज केवल मैं बोलूँगी.. प्लीज़’ , जया का लहज़ा सख़्त था.
‘ मैने उसका प्यार… उसका नाम भी आज याद आ गया है मुझे, पर तुम्हें नहीं बताऊंगी. मैं जानती हूँ तुम्हारी आख़िरी साँस तक वह नाम हथौड़े की तरह तुम्हारे दिमाग़ में बजेगा, इसलिए मेरी संवेदना मुझे इसकी इजाज़त नहीं देती है. दूसरे, उस नाम और उस व्यक्ति से ना मेरा आज कोई सरोकार है और ना ही कभी होगा.’ जया चुप हो गयी, शायद अपनी बात की तसदीक कर रह ही थी अपने मन में झाँक कर.
फिर स्थिर स्वर में बोली, ‘मैं एक स्त्री हूँ. मुझे नहीं पता था मेरा जीवन मुझे कहाँ ले जाएगा. इसलिए और केवल इसलिए मैं उसका या किसी का भी प्यार स्वीकार नहीं कर सकती थी. कोई बोझ अपने मन पर रख कर जीना स्वीकार नहीं था मुझे . सिर्फ़ इसलिए मैने उसका प्यार ठुकरा दिया था. तुम शायद यह बात भी नहीं समझोगे. पर अब कोई फ़र्क नहीं पड़ता अनिरूद्ध. …. मगर तुम एक बात अच्छे से सुनलो कि मैं अब बाकी जीवन उस प्रेम की आराधना करूँगी.’
अनिरूद्ध ने अचानक नज़र ऊपर उठाई.
‘नहीं चौंको मत… जो मेरे मन में पैदा हुआ था और जिसे मैने वहीं छोड़ दिया था, वह प्यार ना उसके लिए था ना तुम्हारे लिए. वह मेरे मन में उपजा मेरा प्यार था. प्यार एक आराधना है . और स्वयं ही आराध्य है. किसी की पूजा या किसी का प्रसाद नहीं है…. उस दिन वह गौण था आज तुम गौण हो गये.’
जया मुस्कुरा रही थी.

प्यार से आगे की कथा

बिहानपुर के राजा ने जब बीरनदे को देखा तो साँस रुक सी गयी. सुघड़ देह, तीखे नयन, स्फटिक रंग- नज़र हटाए नहीं हटी. अपने आप को रोक नहीं पाए, ‘ आप हमारे महल की रानी बनेंगी?’
बीरन ने अपने पुरखुलूस अंदाज़ में कहा,’ महाराज , कहाँ आप और कहाँ मैं ,एक तवायफ़. मान बख्शने के लिए बहुत शुक्रिया. पर माफ़ कीजिए, मैं जहाँ हूँ वही मेरी जगह है.’
राजा को अपमान भी लगा और आश्चर्य भी हुआ.
राजा का चेहरा देख बीरन ने बात संभाली’, ‘ एक बेलगाम तवायफ़ कभी महल की रानी नहीं हो सकती, महाराज .’
राजा ने संयम दिखाया. रोज़ बीरनदे से मिलने लगा और आख़िर महल में रानी बन कर रहने के लिए राज़ी कर लिया. कुछ दिन, प्यार की बौछार में बीरन और राजा सराबोर रहे.
ज़िंदगी को नाच कूद कर सामान्य होने की आदत है. उदासी सामान्यता का बीज लक्षण है. ऐसे ही किसी उदासी के पल में राजा ने बीरन से प्यार की मनुहार कर दी .बीरन की ना कहने की आदत जो मन में कहीं छुप गई थी, होंठों पर आ गयी. राजा के लिए ना भी हाँ ही होती है, बस उस बेचारी ना को थोड़ा आक्रोश झेलना पड़ता है. राजा ने बीरन के साथ बलात अपनी काम पिपासा बुझाई. उसे आभास भी नहीं हुआ कि बीरन के मन में विद्रोह जाग गया है . एक तवायफ़ के आज़ाद मन का विद्रोह.
दूसरे दिन सूरज उगने से पहले ही बीरन पालकी में बैठ कर वापस अपने कोठे पर आ गयी.
राजा क्रोध से आग बगुला हो गया. पर एक तवायफ़ की जान लेने के कलंक से डर गया.
क्या करता? सम्मान भी बचाना था.. आख़िर घोषणा करवा दी, ‘ अगर किसी ने भी बीरन के दर पर कदम रखा तो सर कटवा दिया जाएगा. बीरन का कोठा वीरान हो गया. दो साल बीत गये, कभी दरवाज़ा तक नहीं खुला.
एक दिन दस्तक हुई. बीरन ने झाँक कर देखा तो एक खूबसूरत नौजवान खड़ा था. उसने हिचकते हुए दरवाज़ा खोला और उसे अंदर आने दिया.
” तुम्हें पता है ना अगर राजा को पता चल गया तो तुम्हारा बीच चौराहे सर कटवा दिया जाएगा?”
‘पता है, मगर मुझे इसकी कोई परवाह नहीं, मुझे तुमसे प्यार हो गया है.’ नौजवान के चेहरे पर विश्वास था.
ऐसा निडर प्यार किसे नहीं मोम कर देगा. बीरन विस्मित थी.
उसने पूछा, ‘ पर एक बात बताओ, इतनी जवान और खूबसूरत लड़कियाँ है बिहानपुर में, मैं तो एक तवायफ़ हूँ, मेरी जवानी भी ढल रही है. ऐसा क्या देखा मुझ में कि अपनी जान हथेली पर रख कर तुम मुझ से प्यार करने चले आए.
नौजवान ने पूरे आत्म- विश्वास से कहा,” देखो, लड़कियाँ बहुत है, एक से एक खूबसूरत और गुणवती, पर उनमें कोई कभी रानी नहीं रही.”
बीरन ने नौजवान की आँखों में देखा, उठ कर उसके पास आई, और एक ज़ोरदार थप्पड़ जड़ दिया.
” बाहर निकल जाओ यहाँ से. पुरुष केवल अपने अहम से प्यार करता है. समर्पण क्या होता है उसे पता ही नहीं.

माँ का त्याग

प्रिय कांता जीजी,
नमस्कार !
याद है तुम्हें कान्ता, जीजी ? तुम हाँफती हुई दौड़ी आई थी.
” चल बबलू भाग! कमली ने बच्चे दे दिये.”
माँ बोलती रह गयी, ” अरे ठहरो, थोड़ी लापसी बनाती हूँ.”
हम पहुँचे तो दो नन्हे नन्हे बिलौटे कमली के पेट से चिपटे थे. तीसरा एक सफ़ेद झिल्ली में लिपटा था, कमली चाट चाट कर उस की झिल्ली साफ़ कर रही थी.
हम दोनों मूरत बने देखते रहे. कमली ने हमें घूर कर देखा था, निरीह चमकती आँखों से. और फिर वापस अपने बिलौटे को चाटने लगी थी.
याद है आपको ?
फिर माँ की आवाज़ आयी थी, ” कांता यह लापसी ले जा और कमली को खिला दे.”
तुम वापस आयी तो मुझे घूर कर बोली, ” बबलू, तीसरा बच्चा कहां गया ?”
मेरी आँखें फटी हुई थी. डर के मारे मेरी जीभ सूख गयी थी.
मैंने अटक अटक कर धीमे से कहा था, ” कमली… खा… गयी.”
तुमने रुआंसे होकर माँ को आवाज़ दी थी. ” माँ, माँ ! कमली अपने बच्चे को खा गयी.”
माँ को जैसे अंदेशा था, उसने दुखी स्वर में कहा था , ” यह भूक निपुति डायन है.”
हम चुपचाप लापसी का कटोरा कमली के आगे रखकर चले आए थे. हमें विश्वास नहीं हो रहा था कि एक माँ अपने बच्चे को कैसे खा सकती है.
हम बच्चे थे, माँ ने भी हमें पूरी बात नही बतायी थी. तुम्हें मैं क्या बताऊँ? तुम तो अब ख़ुद एक माँ हो, जानती हो. बस इसलिये बता रहा हूँ कि मुझे माँ का यह अनूठा त्याग अब समझ में आया है.
जीजी, अगर कमली अपने एक बच्चे को नहीं खाती तो उसे पता था कि उसके तीनों बच्चे भूक से मर जाते. उसे अपने बच्चों को बचाने के लिए छाती में दूध चाहिए था. मैंने उसकी आंखों में वह पीड़ देखी थी जब वह अपने को बच्चे खा रही थी.
उसे थोड़े ना पता था कि मेरी दीदी उसके लिए गर्म गर्म लापसी लेकर आ रही है.
अपना ख्याल रखना.
आपका सहोदर
बबलू

एक आँसू

दीदी के दो बार पूछने पर कि बेबी आज तू फिर बहुत अनमनी है, क्या हुआ दीदी को नहीं बताएगी, बेबी से नहीं रहा गया; फफ़क पड़ी.
दीदी उसका सिर अपनी गोद में रख कर सहलाने लगी.
” दीदी आपको देखो जीजाजी कैसे हाथों पर रखते हैं. जान जान करते मुँह सूखता है उनका. और इनको देखो, बात बात पर झगड़ा, जली कटी. एक दिन राज़ी खुशी नहीं जाता.”
दीदी ने कहा,” नहीं रे पगली, ऐसा नहीं सोचते. तू बहुत सुखी है.”
और एक गर्म आँसू बेबी के सिर पर टपका. वह चौंक कर खड़ी हो गयी.
” दीदी आप रो रही हैं?”
” नहीं तो रे. मैंने तो बीस साल पहले ही इस मन को मांज धोकर सूखा कर रख दिया था. पता नहीं यह एक आँसू निगोडा कहाँ अटका रह गया था.”
” क्या कह रही हो दीदी?” बेबी बौखला गई.
दीदी ने संयत होकर कहा,” मैंने ५ साल तक उनको टूट कर प्यार किया. बेल की तरह उनसे लिपटी रही. पर जैसे ही पता चला शादी के पहले दिन से ही कोई ओर भी उनसे लिपटी हुई है, मैं एकदम सूख गई. सब ख़त्म हो गया. आज बीस साल हो गये.
बेबी ने सहमे हुए कहा, ” आप और जीजाजी इतने खुश दिखते हैं. और बीस साल से…? .. ‘बोलते’ भी हैं या नहीं?”
दीदी ने शून्य में देखते हुए कहा,” ‘बोलने’ की कोशिश करते हैं वे. पर मुझे लगता है कोई कठफोड़वा पेड़ के तने से चोंच रगड़ रहा है. मैं काठ हो चुकी हूँ.”
इतने में बेबी का मोबाइल बजा. वह उठा कर थोड़ी दूर चली गई.
” पहुँच गई दीदी के पास. तुम कितनी ओछी औरत हो. ज़रा सा झगड़ा हुआ नहीं की रोने को घुटना चाहिए तुम्हें.”
” राजेश प्लीज़ उल्टा सीधा मत बोलो. मैं आ रही हूँ, थोड़ी देर में.” उसने फोन काट दिया.
दीदी मुस्कुरा कर बोली,” जाओ, अपने घर जाओ. जाकर फिर झगडो. खूब बुरा भला कहो एक दूसरे को. रात को मुँह फेर कर सो जाओ. और फिर देर रात एक दूसरे की छाती में मुँह डाल कर खूब रोओ….. जाओ, तुम बहुत सुखी हो रे पगली.”

क्या बात कही उसने !

सास ने एक नज़र उसे देखा और सीट पर फैले दूध और चाय के तामझाम को सिकोड़ने की कोशिश की. बहू ने बिना देखे ही उसे देखा. बड़े बच्चे ने एक टक उसे देखा और जितना पढ़ना जानता था पढ़ा. छोटा बच्चा सोया था, देखता भी तो उसे यह नहीं पता था कि जिन्हें वह देखता है वे दूसरे लोग हैं. खामोशी बरकरार थी, और उसकी आदत थी देखते ही खामोशी के दो टुकड़े करने की.
” कोई बात नहीं, आंटी, आराम से. मैं समान किसी सीट के नीचे घुसा देता हूँ, और सामने बैठ जाता हूँ. पर हाँ एक कप चाय मेरे लिए भी. घर की चाय देखने के बाद मैं रुक नहीं सकता. अब के तीनों ने उसे एक साथ देखा.
” अरे बेटा आज कल तो पूछने से पहले लोग ना कर देते हैं, तू तो माँग के ले रहा है. अभी देती हूँ.”
” और बेटे, पापा टाय्लेट में हैं, या स्टेशन पर लेने आएँगे.” उसने बच्चे को खुलने का न्योता दिया.
बच्चे ने सवाल को ना सुनने का भाव बनाया. सास और बहू को एक सुपरिचित सा धक्का लगा.
सास ने एक ही वाक्य में बात को ख़त्म करना चाहा,” इसके पापा कारगिल की लड़ाई में शहीद हो गये थे, बेटा.”
उसने बहू की खाली पगडंडी सी माँग को देख कर अपनी बेवकूफी को कोसा. खामोशी फिर पसर गयी. उसे गवारा नहीं था.
” एक बात कहूँ आंटी, आप ईश्वर की चुनी हुई माँ है. भारत को आप पर गर्व है. ये बच्चे जब बड़े होंगे, इनका सर गर्व से ऊँचा रहेगा.”
आंटी, बस सुनती रही.
वह नहीं माना. उसने झुक कर आंटी के पैर छुए. फिर बोला, “मुझे आशीर्वाद दो आंटी कि मैं भी आपके बेटे की तरह एक दिन देश के लिए लड़ता हुआ मरूं.”
“बेटा, तेरे माँ-बाप का कलेजा है तुझे ऐसा आशीर्वाद देने का? फिर मैं कैसे दे दूं.”
वे होते तो मैं उनसे ज़रूर पूछता. माँ, पापा, बड़ा भाई सब एक साथ चले गये. मुझे साइकिल चलानी थी, तो नहीं गया. वे सब सिद्धिविनायक गये थे. बम फटा और कुछ भी नहीं मिला. मैं बहुत छोटा था.” वह एक साँस में कह गया.
आंटी का जी भर आया. ” और लेगा थोड़ी चाय बेटे? इन आतंकवादियों को तो ना चुन चुन कर फाँसी देनी चाहिए.”
” नहीं आंटी नहीं, फाँसी देने से कुछ नहीं होगा. इनको तो स्कूल में भर्ती करके डंडे मारने चाहिएं, रोज़ दो चार डंडे, तब जाकर ठीक होंगे ये , फाँसी वांसी से कुछ नहीं होगा.”
उसकी बच्चे जैसी बात सुनकर आसपास की सवारियों ने तरह तरह के मुँह बनाए- क्या बात कर रहा है यह बुद्धू !
जब भी सोचता हूँ तो लगता है- क्या बात कही थी उसने !