कहा:अनकहा

एक खाली सा रेस्तराँ. मद्धम सी रोशनी. कोने की टेबल.
आकाश ने कहा: प्रेम प्रकृति का सबसे अनुपम उपहार है. धन -दौलत… शोहरत…राजपाट… सब प्यार के आगे बेमानी हैं. तुम अनुमान नहीं लगा सकती, कितना प्यार करता हूँ मैं तुमसे. मेरी आँखों में देखो और डूब जाओ मेरे प्यार की गहराई में. तुम हो भी तो कितनी खूबसूरत. बस… दिल करता है ज़िंदगी भर तुम्हें देखता रहूं. अपनी बाहों में तुम्हें लेकर झूमता रहूं…. तुम्हें इतना प्यार करूँ .. इतना प्यार करूँ …( कितना ? यह प्रश्न ही रहे इसी में प्यार की आबरू है )
ऋतु ने कहा नहीं, पर सोच रही थी: मैंने पहले भी देखी हैं ऐसी प्यार में बौराई आँखे, आकाश. मैं जानती हूँ यह प्यार… यह प्रकृति का अनुपम उपहार, बिना मूल्य चुकाए काम पिपासा तृप्त करने की एक कला है. मैं देख रही हूँ तुम्हारी आँखों में उमड़ते वासना के बादल. मगर मुझे तुम्हें विवश करना है कि तुम अपना पर्स निकालो और मुझ से कहो, ” देखो, बुरा नहीं मानना ऋतु, मैं चाहता हूँ तुम मेरी ओर से अपने लिए एक अच्छी ड्रेस… या एक सुंदर सा पेंडेंट ख़रीदो.” और तीन चार हज़ार हज़ार के हल्के गुलाबी नोट, मेरे मना करने के बावजूद मेरे हाथ में थमा दो. मैं बुरा नहीं मानूँगी. मगर अपने लिए कुछ नहीं लूँगी. मैं वे गुलाबी नोट लेकर सीधी घर जाऊँगी जहाँ मेरी एक जन्म से अल्पबुद्धि बहन, जो आइस-क्रीम खा खा के पद्दड़ हो गयी है, और जो कुछ नहीं जानती कि पैसा कहाँ से आता है, और साथ ही मेरी माँ जो खूब जानती है कि किसी भी नौकरी में ऐसे महीने के बीच में थोड़ी थोड़ी करके तनख़्वाह नहीं मिलती है, दोनों मेरा इंतज़ार कर रही हैं.

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