जब सब जुआले में बैठ
मेरी छोटी सी उपलब्धि को
बड़ा करके बताते थे.
वह चुप रहता था.
उसने कभी मेरी प्रशंसा नहीं की
कभी भी नहीं
बहुत शब्द थे उसके पास
पर वह नहीं चाहता था
उनमें बाँधना
मेरी छोटी छोटी उपलब्धियों को.
वह मेरा पिता था.
और घर के आँगन में
अपने थोड़े से शब्दों को दिन भर
लुटाती थी वह
मेरी छोटी छोटी उपलब्धियों को बड़ा करने में
वह मेरी माँ थी.

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सने हाथ

ताऊ जी चले गये तो ताई चन्दरो ने ना कभी गोबर में हाथ डाला ना चिमनी साफ की. जिसको चाहिए, करे.
मुझे याद है ताऊ जी के गली में दिखते ही बहुएँ दहलीज छोड़ कर अंदर हो जाती थी और बच्चे खेल से टाइम-आउट लेकर कोटरे की ओर इतला करने भागते थे- ” ताऊ जी आ गये! ताऊ जी आ गये!” बिल्कुल वैसे ही जैसे चिड़ियाँ और बंदर, पेड़ों तले ऊंघते हिरणों को शेर के आने की सूचना देते हैं. हमारे बिना मूछों के ताऊ जी का रुआब क्या था, समझिए आतंक था. वे कोटरे के सब कुछ थे- कर्ता- धर्ता, सुप्रिमो, या कहिए तानाशाह. इस तानाशाही को सबसे ज़्यादा झेलना होता था ताई को ही.
डर की इज़्ज़त पुराने से है, और इतनी है कि उसके प्रति नफ़रत को साँस लेने की जगह भी नहीं होती है. ऐसे में बग़ावत दफ़्न हो जाती है, मगर लगता है ज़मींदोज़ होकर भी ज़िंदा रहती है.
ताऊ जी के आने की मुनादी होते ही ताई चन्दरो भाग कर गोबर में हाथ डाल देती, उपले थापने के बहाने. और जब कभी नहीं हुआ तो चिमनी साफ करने बैठ जाती. और फिर बड़े ही खेदपूर्ण अंदाज़ में बोलती, ” अरे रज्जो, देख तेरे ताऊ जी को पानी तो दे. मेरे तो देखो हाथ ही सने हुए हैं मरे!”
ताई चन्दरो ने हमेशा ताऊ जी की इज़्ज़त की, उनके रुआब को माना, लोगों के सामने हमेशा उनकी बड़ाई की, मगर अपने हाथ से कभी पानी नहीं दिया. उनके हाथ हमेशा बग़ावत में सने रहे.

आराधना

‘ तुमने हमारी पहली रात एक बहुत ही तुच्छ सा सवाल किया था मुझ से…. ‘तुमने किसी से पहले प्यार किया है क्या?’ जवाब में मैने चुप्पी साध ली थी. एक बहुत लंबी चुप्पी. नौ साल लंबी हो गयी है मेरी खामोशी. आज जवाब देने का दिन आया है.’
बेखुदी में जया के कुछ आँसू गालों पर ही सूख गये थे, कुछ अभी भी बह रहे थे. उसने सबको समेटा और अपने आपको संयत किया.
‘आज तुम कह रहे हो तुम्हें किसी से प्यार हो गया है, और हमें अलग हो जाना चाहिए… तो सुनो! कोई था जो मुझ से बहुत प्यार करता था. मुझे उसके प्यार में कोई खोट नहीं दिखा पर फिर भी मैने अस्वीकार कर दिया था. तुम्हारा पुरुष का छिछला मन मेरे कारण को नहीं समझ पाएगा, इसीलिए मैने चुप्पी साध ली थी. पता नहीं मेरी चुप्पी का क्या मतलब निकाला होगा…’
‘नहीं मैने कभी तुम पर कोई शक़ …’ , अनिरूद्ध ने बीच में बात काट दी.
‘मैं नौ साल चुप रहीं हूँ… आज केवल मैं बोलूँगी.. प्लीज़’ , जया का लहज़ा सख़्त था.
‘ मैने उसका प्यार… उसका नाम भी आज याद आ गया है मुझे, पर तुम्हें नहीं बताऊंगी. मैं जानती हूँ तुम्हारी आख़िरी साँस तक वह नाम हथौड़े की तरह तुम्हारे दिमाग़ में बजेगा, इसलिए मेरी संवेदना मुझे इसकी इजाज़त नहीं देती है. दूसरे, उस नाम और उस व्यक्ति से ना मेरा आज कोई सरोकार है और ना ही कभी होगा.’ जया चुप हो गयी, शायद अपनी बात की तसदीक कर रह ही थी अपने मन में झाँक कर.
फिर स्थिर स्वर में बोली, ‘मैं एक स्त्री हूँ. मुझे नहीं पता था मेरा जीवन मुझे कहाँ ले जाएगा. इसलिए और केवल इसलिए मैं उसका या किसी का भी प्यार स्वीकार नहीं कर सकती थी. कोई बोझ अपने मन पर रख कर जीना स्वीकार नहीं था मुझे . सिर्फ़ इसलिए मैने उसका प्यार ठुकरा दिया था. तुम शायद यह बात भी नहीं समझोगे. पर अब कोई फ़र्क नहीं पड़ता अनिरूद्ध. …. मगर तुम एक बात अच्छे से सुनलो कि मैं अब बाकी जीवन उस प्रेम की आराधना करूँगी.’
अनिरूद्ध ने अचानक नज़र ऊपर उठाई.
‘नहीं चौंको मत… जो मेरे मन में पैदा हुआ था और जिसे मैने वहीं छोड़ दिया था, वह प्यार ना उसके लिए था ना तुम्हारे लिए. वह मेरे मन में उपजा मेरा प्यार था. प्यार एक आराधना है . और स्वयं ही आराध्य है. किसी की पूजा या किसी का प्रसाद नहीं है…. उस दिन वह गौण था आज तुम गौण हो गये.’
जया मुस्कुरा रही थी.

आँखें

मेरी ये दो आँखें
प्रमाण नहीं हैं कि मैं बच गया
और आज जीवित हूँ
बल्कि गवाह हैं
उस नरसंहार की जो कल हुआ.
बर्बरता एक बात है
और बर्बर अनदेखी भी उसी बात की बात है.

पुरुष

बस रोज़ की तरह खचाखच भरी थी. एक लड़के ने जो वास्तव में पुरुष था अपनी सीट नहीं छोड़ी बल्कि खूब सिमट कर उसके लिये एक सीट बनाई. वह बैठ गयी. बस चली ही थी कि लड़के की जाँघ का दबाव उसे महसूस हुआ. लड़के की उम्र लगभग उसके बेटे की जितनी थी. बस की गति के साथ यह पुरुषनुमा लड़का उसकी ओर ढलने लगा. उसने अपना ध्यान हटाने की कोशिश की.
बस में केवल तीन औरतें और थी. उंनके साथ के पुरुषों ने उन तीनों को अपने हाथों और देह की दीवार में सुरक्षित किया हुआ था. उन तक केवल बहुत सी आँखें पहुँच रही थी. उसे अचानक औरत कि बहुमूल्यता का एह्सास हुआ तो उसने अपने पैर की सहमी हुई मासंपेशी को ढीला कर पुरुषनुमा लड़के की लंपटता के लिए छोड़ दिया.
वह रोज़ के अपने सफर में इस से कहीं ज़्यादा देख चुकी थी- अपने ऊपर ढहता हुआ आदमी, अपने वक्ष में चुभती हुई मर्दाना कुहनी, और इस से भी कहीं ज्यादा. उसे अचानक उस बस में आड़े टेढ़े बैठे खड़े सभी पुरुषों पर तरस आ गया. पुरुषनुमा लड़के पर भी. अपने पुरुष बन रहे बेटे पर भी. ख़ास तौर से अपने पति पर, जो घर पहुँचते ही उस से, क्या रहा, कैसा रहा, जैसे कुछ सवाल पूछेगा, इस मक़सद से कि किसी पुरूष से तो मुलाकात नहीं हुई थी.
वह बस से उतरी तो उसके चेहरे पर हँसी जैसा कुछ था,जो हँसी नहीं थी.

बर्फ

“बताओ, सुबह ६ बजे आ के खड़ी हो गयी. – ‘ बहनजी बर्फ है क्या थोड़ी’. मुँह पूरा ढक रखा था. बड़े घर की बहू बनी फिरती है.’
दूसरी औरत बोली, ” अरे बर्फ जमानी आती नहीं होगी. पीछे तो फ़्रिज़ देखा नहीं होगा. हमारे साथ की थी एक- गिन्दो नाम था. शादी हो के चंडीगढ़ चली गयी. घरवाला आया तो रात को अंधेरे में बैठी थी. बोला रे, लाइट तो जला लेती. कहने लगी, मैने तो पूरी माचिस ख़तम करदी, यह मरा बल्ब जलता ही नहीं.” कह के दोनों ज़ोर से हँसने लगी.
पास ही तुरपाई करती बुढ़िया से नहीं रहा गया, ” अरे बेशरमो, क्यों जान कर अंजान बन रही हो. औरत का नसीब ही ऐसा है, मार भी खाए और शर्म के मारे सूजा हुआ मुँह भी छिपाए.”
सुन कर दोनो चुप हो गयी.
फिर एक बोली, ” हाँ रे, उनकी नौकरानी कह तो रही थी-‘ इस बात में तो जैसी हमारी जिनगी वैसी ही इन पैसेवालियों की. कल से पेट दर्द का बहाना करके कमरे में पड़ी है बेचारी.”
सारी बर्फ रात को छोटा ठाकुर के गिलास में चली गयी थी.