अलग भाव अलग दिशा

उत्तर से आती युवा सैनिकों से भरी बस लाल बत्ती पर रुकी. उसी समय पूर्व से एक राजनीतिक कार्यकर्ताओं का दल आया. उन्हें लालबत्ती पर रुकने की दरकार नहीं थी. पर युवा सैनिकों को देख कर उनका देशप्रेम छलक आया था. सैनिकों के चेहरों पर एक तटस्थ सी मुस्कान थी. कार्यकर्ताओं के हाथ में झंडे थे.

भावातिरेक में कार्यकर्ता ज़ोर ज़ोर से देश- प्रेम के नारे लगाने लगे. भाव विहीन सैनिक बस के शीशों से उन्हें देख रहे थे. कार्यकर्ता चाह रहे थे सैनिक नारों में उनके साथ हाथ उठाएँ तो मज़ा आए. मगर सैनिक स्थिर मुद्रा में बैठे रहे.
बस दक्षिण की ओर चली गयी, कार्यकर्ताओं का जुलूस पश्चिम की ओर.

एक मील गये होंगे कि सैनिकों ने देखा उनकी दाहिनी ओर एक तीन मंज़िला इमारत में ज़ोर की आग लगी है. इधर कुछ बीस कदम गये होंगे कि कार्यकर्ताओं को सामने से दूसरी पार्टी के कार्यकताओं का जुलूस आता दिखा. सैनिक बस से कूदे. चेहरे पर कपड़े का मास्क बाँधा और इमारत की ओर दौड़े. कार्यकर्ता फ़िर ज़ोर ज़ोर से वही नारे लगाने लगे. नारे वही थे पर उनकी आवाज़ में अब आक्रोश था, और तेवर में हिंसा. दूसरी और से भी वैसे ही नारे लगने लगे और देखते ही देखते दोनों ओर के झंडे लाठियों में बदल गये.

इधर सैनिक इमारत में फँसे, रोते चिल्लाते, बच्चों और औरतों को एक एक कर हिफ़ाज़त से बाहर निकाल रहे थे. उधर दोनों पार्टियों के कार्यकर्ता झंडे , माफ़ कीजिए, लाठी बरसा कर एक दूसरे को लहूलुहान कर रहे थे. भीड़ इधर भी जमा हो गई थी और उधर भी.

सैनिकों ने जलती हुई इमारत से सभी को बचा लिया है. वे अपना काम पूरा कर, बिना किसी से बात किए बस में बैठ कर दक्षिण की ओर चले गये हैं.

कार्यकर्ताओं की मुठभेड़ में तीन लोग मारे गये हैं और लगभग बीस घायल हुए हैं. पुलिस का दल बल पहुँच गया है. दोनों पार्टियों के बड़े नेता मीडीया को अपना अपना बयान दे रहे हैं.

पश्चिम में सूरज छिप रहा है और उसकी हल्की लाली दक्षिण के आकाश पर फैल रही है.

क्या बात कही उसने !

सास ने एक नज़र उसे देखा और सीट पर फैले दूध और चाय के तामझाम को सिकोड़ने की कोशिश की. बहू ने बिना देखे ही उसे देखा. बड़े बच्चे ने एक टक उसे देखा और जितना पढ़ना जानता था पढ़ा. छोटा बच्चा सोया था, देखता भी तो उसे यह नहीं पता था कि जिन्हें वह देखता है वे दूसरे लोग हैं. खामोशी बरकरार थी, और उसकी आदत थी देखते ही खामोशी के दो टुकड़े करने की.
” कोई बात नहीं, आंटी, आराम से. मैं समान किसी सीट के नीचे घुसा देता हूँ, और सामने बैठ जाता हूँ. पर हाँ एक कप चाय मेरे लिए भी. घर की चाय देखने के बाद मैं रुक नहीं सकता. अब के तीनों ने उसे एक साथ देखा.
” अरे बेटा आज कल तो पूछने से पहले लोग ना कर देते हैं, तू तो माँग के ले रहा है. अभी देती हूँ.”
” और बेटे, पापा टाय्लेट में हैं, या स्टेशन पर लेने आएँगे.” उसने बच्चे को खुलने का न्योता दिया.
बच्चे ने सवाल को ना सुनने का भाव बनाया. सास और बहू को एक सुपरिचित सा धक्का लगा.
सास ने एक ही वाक्य में बात को ख़त्म करना चाहा,” इसके पापा कारगिल की लड़ाई में शहीद हो गये थे, बेटा.”
उसने बहू की खाली पगडंडी सी माँग को देख कर अपनी बेवकूफी को कोसा. खामोशी फिर पसर गयी. उसे गवारा नहीं था.
” एक बात कहूँ आंटी, आप ईश्वर की चुनी हुई माँ है. भारत को आप पर गर्व है. ये बच्चे जब बड़े होंगे, इनका सर गर्व से ऊँचा रहेगा.”
आंटी, बस सुनती रही.
वह नहीं माना. उसने झुक कर आंटी के पैर छुए. फिर बोला, “मुझे आशीर्वाद दो आंटी कि मैं भी आपके बेटे की तरह एक दिन देश के लिए लड़ता हुआ मरूं.”
“बेटा, तेरे माँ-बाप का कलेजा है तुझे ऐसा आशीर्वाद देने का? फिर मैं कैसे दे दूं.”
वे होते तो मैं उनसे ज़रूर पूछता. माँ, पापा, बड़ा भाई सब एक साथ चले गये. मुझे साइकिल चलानी थी, तो नहीं गया. वे सब सिद्धिविनायक गये थे. बम फटा और कुछ भी नहीं मिला. मैं बहुत छोटा था.” वह एक साँस में कह गया.
आंटी का जी भर आया. ” और लेगा थोड़ी चाय बेटे? इन आतंकवादियों को तो ना चुन चुन कर फाँसी देनी चाहिए.”
” नहीं आंटी नहीं, फाँसी देने से कुछ नहीं होगा. इनको तो स्कूल में भर्ती करके डंडे मारने चाहिएं, रोज़ दो चार डंडे, तब जाकर ठीक होंगे ये , फाँसी वांसी से कुछ नहीं होगा.”
उसकी बच्चे जैसी बात सुनकर आसपास की सवारियों ने तरह तरह के मुँह बनाए- क्या बात कर रहा है यह बुद्धू !
जब भी सोचता हूँ तो लगता है- क्या बात कही थी उसने !