कमज़ोर औरत

ताई रामदेइ का जैसे आख़िरी वक़्त नज़दीक आया, चेहरे पर संतोष बढ़ता गया. देखकर अजीब सा लगता था.
अब अस्पताल में केवल इसलिए रखा हुआ था प्राण निकलें तो कोई तकलीफ़ नहीं हो. रंडुए की घरवाली बनकर खूब सेवा की सरपंच की, और घर भी संभाला.
मेरा गाँव जाना हुआ तो मिलने गया. बस एक आध दिन की मेहमान थी. मुझे देख कर मुस्कुराइ.
मैने भी हल्के से मज़ाक किया, ” ताई, यहाँ अस्पताल में मरने आई है क्या तीर्थ करने? बड़ी सुखी लग रही है.”
मेरी तरफ़ रहस्यभरी नज़र से देख कर, हल्के से हँसी, ” सचमुच बहुत सुखी हूँ बेटे.”
थोडा रुकी, फिर बोली, ” वैसे तू भी दुनिया की तरह सोच रहा होगा कि मैने सरपंच का घर क्यों बसाया?”
” ताई देख अब तेरे से क्या छुपाऊँ, सारे गाँव को शक है कि सरपंच ने ही तेरे आदमी को मरवाया, पर सबको अचंभा है कि ऐसी भी क्या औरत कि अपने पति के हत्यारे की ही चूड़ियाँ पहन ली और घर बार संभाला, इतने अच्छे से. ” मैने पूछ ही लिया
“बेटा, गाँव को तो तो शक है पर मुझे नहीं….. मुझे तो पक्का पता है कि सरपंच ने ही मेरे आदमी को मारा था.”
” और फिर भी ताई…?” शब्द मेरे होठों से छूट गये.
“क्या करती बेटे ? औरत कमज़ोर होती है,बहुत कमज़ोर.” ताई सोच में कहीं दूर चली गयी थी. “और सरपंच की घरवाली भी तो १ साल के लड़के को छोड़ कर चली गयी थी. मैं भी औरत हूँ, समझा मेरा गुज़ारा हो जाएगा और उसका बच्चा पल जाएगा.”
“पर ऊपर वाले की लाठी में आवाज़ नहीं होती ताई, सही कहा है. दस साल का पाला पलाया लड़का कुएँ में पड़ के मर गया. कैसे जान डाल रखी थी सरपंच ने उसमें. और आप का भी तो कितना लाड़ला था. कोई सग़ी माँ भी इतना नहीं कर सकती.” मैं कहे बिना नहीं रह सका.
“सही है बेटा, मैने भी लाड़ तो बहुत किए उसके. पर ज़िंदगी का हिसाब तो पूरा करना ही पड़ता है. क्या छाती पीट कर रोई थी मैं. सचमुच कलेजा फट रहा था . पर क्या करती? ” ताई फिर खो गयी.
“आज भी याद है सरपंच बार बार कह रहा था मेरे नंदू की तगड़ी में एक ढबली सिक्का था तांबे का. अगर लड़का पैर फिसल के गिरा तो सिक्का कहाँ गया ?” ताई की आँख नम हो गई.
फिर अपनी थैली खोली, उसका कोना फाड़ कर तांबे का सिक्का निकाला और बोली, ” ले बेटा, मेरे प्राण निकलते ही यह सरपंच को दे देना. बोलना हिसाब बराबर हो गया. इसी दिन के लिए छुपा कर रखा था “

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आराधना

‘ तुमने हमारी पहली रात एक बहुत ही तुच्छ सा सवाल किया था मुझ से…. ‘तुमने किसी से पहले प्यार किया है क्या?’ जवाब में मैने चुप्पी साध ली थी. एक बहुत लंबी चुप्पी. नौ साल लंबी हो गयी है मेरी खामोशी. आज जवाब देने का दिन आया है.’
बेखुदी में जया के कुछ आँसू गालों पर ही सूख गये थे, कुछ अभी भी बह रहे थे. उसने सबको समेटा और अपने आपको संयत किया.
‘आज तुम कह रहे हो तुम्हें किसी से प्यार हो गया है, और हमें अलग हो जाना चाहिए… तो सुनो! कोई था जो मुझ से बहुत प्यार करता था. मुझे उसके प्यार में कोई खोट नहीं दिखा पर फिर भी मैने अस्वीकार कर दिया था. तुम्हारा पुरुष का छिछला मन मेरे कारण को नहीं समझ पाएगा, इसीलिए मैने चुप्पी साध ली थी. पता नहीं मेरी चुप्पी का क्या मतलब निकाला होगा…’
‘नहीं मैने कभी तुम पर कोई शक़ …’ , अनिरूद्ध ने बीच में बात काट दी.
‘मैं नौ साल चुप रहीं हूँ… आज केवल मैं बोलूँगी.. प्लीज़’ , जया का लहज़ा सख़्त था.
‘ मैने उसका प्यार… उसका नाम भी आज याद आ गया है मुझे, पर तुम्हें नहीं बताऊंगी. मैं जानती हूँ तुम्हारी आख़िरी साँस तक वह नाम हथौड़े की तरह तुम्हारे दिमाग़ में बजेगा, इसलिए मेरी संवेदना मुझे इसकी इजाज़त नहीं देती है. दूसरे, उस नाम और उस व्यक्ति से ना मेरा आज कोई सरोकार है और ना ही कभी होगा.’ जया चुप हो गयी, शायद अपनी बात की तसदीक कर रह ही थी अपने मन में झाँक कर.
फिर स्थिर स्वर में बोली, ‘मैं एक स्त्री हूँ. मुझे नहीं पता था मेरा जीवन मुझे कहाँ ले जाएगा. इसलिए और केवल इसलिए मैं उसका या किसी का भी प्यार स्वीकार नहीं कर सकती थी. कोई बोझ अपने मन पर रख कर जीना स्वीकार नहीं था मुझे . सिर्फ़ इसलिए मैने उसका प्यार ठुकरा दिया था. तुम शायद यह बात भी नहीं समझोगे. पर अब कोई फ़र्क नहीं पड़ता अनिरूद्ध. …. मगर तुम एक बात अच्छे से सुनलो कि मैं अब बाकी जीवन उस प्रेम की आराधना करूँगी.’
अनिरूद्ध ने अचानक नज़र ऊपर उठाई.
‘नहीं चौंको मत… जो मेरे मन में पैदा हुआ था और जिसे मैने वहीं छोड़ दिया था, वह प्यार ना उसके लिए था ना तुम्हारे लिए. वह मेरे मन में उपजा मेरा प्यार था. प्यार एक आराधना है . और स्वयं ही आराध्य है. किसी की पूजा या किसी का प्रसाद नहीं है…. उस दिन वह गौण था आज तुम गौण हो गये.’
जया मुस्कुरा रही थी.