चला गोली!…चला गोली!….चला गोली!

मैं आसमाँ सा बुलंद हूँ
मैं हवा सा हूँ रवाँ रवाँ
मैं ज़मीं से ज़्यादा ठोस हूँ
मैं धधक रहा हूँ आग सा !
चला गोली!… चला गोली!…चला गोली!
उठा बंदूक और तू दाग ऊपर की तरफ
तेरी लाचार सी गोली उडेगी कुछ ऊँचाई
गिरेगी टन से आकर फर्श पर खाली कटोरी सी, चला गोली!
चला फिर से निशाना बाँध अच्छे से
ज़रा सी दूर जाएगी घिसटती हवा में
और गिर पड़ेगी
कहीं मलबे में या खुल्ले गटर में, चला गोली!
चला आक्रोश में और बेध दे धरती का सीना
तेरी गोली उसी लम्हा दफ़न हो जाएगी
लगेगी हाथ बरसों बाद एक मज़दूर को
थमा देगा उसे जो हाथ में बच्चे के अपने
और कहेगा- ले बेटा खेल इस से, चला गोली!
रंग दे लाल लपटों को तेरे खूनी इरादों से
जो तेरा हाथ कांपे, साँस लेले, फिर चला
यह तेरा आख़िरी है वार
पिघल जाएगी अबकी बार गोली देख ले
बन जाएगी एक पीतल का पारा सोच ले
तुझे फिर हार कर बंदूक अपनी डालनी होगी
फ़तह मेरी ही होगी
क्योंकि मैं मर नहीं सकता
कभी भी मर नहीं सकता
मैं ख़याल हूँ . मैं ख्याल हूँ
मेरा ना जिस्म है कोई ना कोई उम्र है
मेरी हद है ना कोई दायरा है

मैं आसमाँ सा… मैं हवा सा…
मैं धरती सा… मैं आग सा..
मैं ख़याल हूँ… मैं ख़याल हूँ
चला गोली!

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मेहसाणा से रामलाल गाँव लौटा तो उसी शाम तीन कोस चलकर चंदू के जुआले आया. सबसे दीना भगत की राम राम कही.
सबने रामलाल की आवभगत की और देर रात तक भगत की भलमांसत की बातें चलती रही. पुरानी बात है .
कहाँ है बताओ चआईबासा- धनबाद के पास. देवकी सेठानी कनीना आई तो तांगा कर के सीहोर भी आई . दादी चावली ने ज़ोर देकर कहा था, ‘ देख देवकी सीहोर जरूर जाना और मेरी तरफ़ से बिहारी के बालकों का सिर पुच्कारना .” सारे दिन दादी चावली की रसोई की बातें चली थी. पुरानी बात है .
परसों दिल्ली से चाचा जी ने मिठाई का डब्बा भेजा था. पता नहीं क्या मिठाई थी. कल रखी रही . आज काम वाली को देनी पड़ी.