पप्पू महान

बाबा मुरली ने आख़िर दिल्ली की ओर बढ़ने की हिम्मत की . पूंजी लेकर निकले एक कनस्तर देसी घी. १९५७ में दस कोस पैदल साथ चलने वाले बीस मिलते थे, पर ५ रुपये देने वाला एक नहीं था. कनीना से लेकर सराय रोहेल्ला तक कनस्तर को दोनों टाँगों में रखे बैठे रहे. एक सज्जन जो कई देर से साथ बैठा था, आख़िर बोला,” बाबा ज़रा पेशाब बगैरा करना है तो कर लो, अभी तो मैं हूँ, कनस्तर का ध्यान रखूँगा.” और अगले ने ध्यान रखा भी. मुरली बाबा घबराए से लौटे तो कनस्तर अपनी जगह था.
‘आज भी शराफ़त है दुनिया में, सीहोर जाकर बताना पड़ेगा.’
पुरानी दिल्ली उतर कर कनस्तर सिर पर उठाया और कंपनी बाग में से पगडंडी पकड़ी तो कनस्तर में कुछ लुढ़का इधर से उधर. खटका हुआ. तसल्ली कहाँ थी,वहीं रख कर खोल लिया. भाठे भरे थे. ‘ राम गाम ठग लिया रे मुरली को तो.’ वहीं मचा दी- डा..रे! बा..रे ! छनुआ की मा रे !
बाबा को लगा दिल्ली इकट्ठी हो जाएगी. कोई छोटी बात थोड़े ना थी. दो घंटे रो धो कर लोगों का मनोरंजन करके, खाली पीपा उठाया और लाला जानकीदास की गद्दी ढूंढी. लाला ने व्यथा सुनी तो भोजन कराया और ब्राह्मण देवता को ५ रुपये दक्षिणा के दिए. लौटे तो फिर मुरली बाबा ने कभी ठगों की नगरी दिल्ली की तरफ मुँह नहीं किया.
छन्नू चाचा को लोगों ने बहुत समझाया कि भई दिल्ली चला जा, कुछ ना कुछ रोटी कमाने का रास्ता निकल जाएगा. मगर कभी हिम्मत नहीं कर पाए. गये दो तीन बार तो कनीना स्टेशन पर झोला खोल कर चूरमा खा लिया और वापस सीहोर आ गये. पैर ही आगे नहीं बढ़े.
समय ने करवट ली. छन्नूलाल के छोटे पुत्र और मुरली पंडित के प्रपौत्र पप्पू लंगड़ा ने पाँचवी में फेल होते ही ठान ली, दिल्ली जाएगा. लंगड़ा कुछ ऐसा कि एक पैर से चलता है और एक से धरती को लात मारता है. एक दिन किसी से नई पैंट माँगी, किसी से काला चश्मा- यह कह कर कि दो दिन के लिए जीजी की ससुराल जाना है- और पकड़ ली बीकानेर मेल, डब्ल्यू टी. पक्के इरादे से जैसे पुरखों का बदला लेना है. रोटी की भी फ़िक्र नहीं. कोई साला खा रहा हो तो उसको ऐसे घूरना कि बाँट कर खाने को मजबूर हो जाए. किसी के बटुए ने जेब में हलचल की तो पप्पू के हाथ में. स्टेशन पर उतरा तो नये जूते थे और हाथ में सूटकेस. दिल्ली को मिल गया था कोई उसके जैसा ही.
पिछले दिनों मैं मिलने गया तो गर्व से बता रहा था, ” भाई मेहनत बहुत करनी पड़ी, पर अब कोई कमी नही है. रोहिणी में फ्लॅट ले लिया, भागीरथ पॅलेस में दूकान.”
मैं मन ही मन कह रहा था, ” तूने दिल्ली फ़तह कर ली यार. आख़िर मुरलिया सलतनत की नीव रख दी. पप्पू महान.”

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