चिड़िया

नीले फूल के लिबास में लिपटी हुई, गठरी होकर पड़ी है. कभी कभी एक कंपन सा होता है. नींद में डरावने सपने तो उसे बहुत आएँगे, अभी तो वह धीरे धीरे सुबक रही है. यह है उसकी तस्वीर जो हर टीवी चॅनेल बार बार दिखा रहा है. बलात्कार को लेकर गलाफाड़ बहस चल रही है. वह और घबरा रही है.
पता चला वह मेरे एक पुराने मित्र की बेटी है. मैं अपने मित्र से मिलने नहीं जाऊँगा क्योंकि अभी तक हमने ऐसे मौके पर सहानुभूति दिखाने के लिए शब्द नहीं बनाए हैं. मैं कोई भी शब्द बोलूं उसे चुभेगा. और उस लड़की के सर पर हाथ रखने का अधिकार मैं खो चुका हूँ. भेड़िया एक जानवर का नाम है, वह भेड़ खाए या ना खाए.
मुझे याद है मैं उसे चिड़िया कह कर बुलाता था. जब देखता था उसे दूसरे बच्चों के साथ खेलते हुए. बारीक आवाज़ में चपर चपर बोलती थी.
” देखो भई मैं तो अगले जन्म में चिड़िया बनूँगी.”
मैने एक दिन पूछा, ” यह भी तो बताओ तुम पिछले जन्म में क्या थी?”
“मैं तो चिड़िया ही थी.” उसने सकुचा कर कहा था.
“अरे चिड़िया ही थी और चिड़िया ही बनोगी?”
मेरी बात काट कर बोली, ” इसलिए कि चिड़िया फुर्र से उड़ जाती है, किसी के हाथ नहीं आती.” मैने उस दिन उसकी हँसी में छिपा भय नहीं देखा था. पर आज सामने आ गया था.
पिछले जन्म का भय… अगले जन्म का भय. स्मृति में भी भय… स्वपन में भी भय.
मगर इस जन्म का क्या चिड़िया? तुम नहीं उड़ पाई ना फुर्र से… मैं फूट फूट रो पड़ा.
अपने आक्रोश पर छींटे मार लेने के बाद मैं सोच रहा था.
अब कोई फ़ायदा नहीं. अब तुम चिड़िया नहीं बनना. अगले जन्म में भी. लड़की ही बनना. अब तुम्हे फुर्र से उड़ कर नहीं, अपने पैरों पर चल कर जीतना है.
हाँ, मैं तुम्हें चिड़िया ही बुलाऊँगा.

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