औरत

सम्पत चाचा गाँव का अपना एक कच्चे कोठे और छप्पर का घर, उसमें दुबक कर बैठा अपना ग़रीब परिवार, और अपने ताश के जोड़ीदार, सब छोड़ छाड़ कर एक दिन निकल गये. शादी की उम्र लाँघ चुके थे, बाकी तो गाँव में धूल थी. पहुँच गये सादुलपुर. कुछ दिन बाद सुनने में आया, वहाँ हलवाई की दुकान खोल ली है. गाँव में लड्डू बनाने में हलवाई का दायां हाथ होते थे, सो बात कुछ जॅंच सी गयी.
कई साल गुज़र गये. कच्चे कोठे और छप्पर के घर में ग़रीबी थी कि छाए जा रही थी. एक दिन वहीं से बात उठी कि संपत ने काम फैला लिया है. पैसे बरस रहें है.
कोठे और छप्पर के दिन बदलेंगे, सबको लगने लगा. सवाल उठा, ” भई क्या कर रहा है सम्पत नोटों का? बिछा के सो रहा है क्या?”
जवाब आया, वहीं से, कच्चे कोठे और छप्पर से- ” औरत.”
” सुन लो भई, औरत के चक्कर में फँस गया है सम्पत. ऐसा लपेट लिया है, वह कमा रहा है, और अगली राज कर रही है. इधर घर वाले मरो भूखे. क्या ज़माना आया है.”
बीस साल बीत गये. संपत चाचा सीहोर में मिसाल के तौर पर याद किए जाने लगे.
एक दिन लौट आए. सर पर हलवाई के दो तीन औज़ार रखे थे. साथ में एक दूर की बहन और उसका घरवाला था.
” बड़ी मुश्किल से समझा कर लाए हैं. वहाँ सादुलपुर में एक धर्मशाला में पड़ा था. बताओ ऐसे में मर जाए तो कोई फूँकने वाला भी नहीं मिले.”
“और जो दोनों हाथों से नोट समेट रहा था, क्या हुआ उस कमाई का?”
सम्पत चाचा तिनके से रेत पर कुछ लिखते रहे. मुँह बोली बहन ने मुँह बिचकाया. पर कच्चे कोठे और छप्पर ने फिर बात संभालने की कोशिश की.
” औरत, भई? क्या बचना था. सही तो कहती है दुनिया कि औरत ही बसाती है और वही आदमी को बर्बाद करती है.”
सम्पत चाचा ने बाकी ज़िंदगी बीड़ी फूँकने और पत्ते खेलने में काट दी. आज भी सम्पत का ज़िक्र चलता है तो औरत की बात निकल ही आती है.
औरत ही तो नहीं थी वरना संपत चाचा की ज़िंदगी भी रो धो कर ज़िंदगी सी तो होती.

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दो सगी लघुकथाएं

1. मन का टुकड़ा
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पूजा … चाय … अखबार . सोफे पर आकर बैठ जाती हैं पुष्पा जी तब जाकर सूरज बालकनी से हटता है . रूटीन .
” क्या बचा है बताओ ? किसी ने सर्वे किया है- ‘सत्तर प्रतिशत लड़कियां चाहती हैं उनका होने वाला पति सेक्स का अनुभव रखता हो .’ शी… ! कितनी और गिरेगी इंसानियत . और अब तो लड़कियां ही हदें पार कर रही हैं. ”
“औरत उदारमना होती है और प्रैक्टिकल भी . अपने हक़ से अधिक अपेक्षा नहीं रखती है . ये लडकियां जानती हैं जो इनके पास नहीं हैं उसकी एक लड़के से उम्मीद रखना नादानी है . सो सोच ही बदल लो या बदल जाने की वकालत करो .”
” मगर आदमी अब गुफा में रहने वाला जानवर नहीं है . हज़ारों साल हो गए उसे प्यार और विश्वास का दम भरते हुए . वह जानवरों की तरह रुत आने पर पर चलते फिरते सेक्स नहीं करता है . पहले उस का मन कहीं जाकर टिकता है तब कहीं जाकर वह अपना तन किसी को सौंपता है. और यह मान कर चलो कि एक बार तन सौंप दिया तो मन का एक टुकड़ा तो वहां छूटेगा ही छूटेगा .” वे उद्वेलित हो गयी थी .
” पर यह भी तो जानो कि मनुष्य परिस्थितियों का गुलाम होता है और मन के साथी को ढूँढ़ने की यात्रा में कहीं पड़ाव आ सकता है .. और यह मन के टुकड़े की बात जो आप कह रहीं है . हम कोई बर्तन तो हैं नहीं कि एक किनारा टूट गया तो टूटा ही रहेगा . पेड़ की शाख अगर टूट जाये तो कुछ साल बाद पता भी नहीं चलता कहाँ से टूटी थी.”
“बहस में तो किसी को जीतने दोगे नहीं! जो गलत है उसको गलत कहने का साहस रखो. एक बलात्कार की पीड़ित के तो केवल तन पर आघात होता है . उसका मन पवित्र और साबुत होता है, पर उसका तो कोई पुरुष आगे बढ़ कर हाथ नहीं पकड़ता है. बात करते हैं , बर्तन की , पेड़ की ! और ये जो मन के टुकड़े बांटती फिरती हैं उनकी हिमायत कर रहे हो !”
मैंने स्वयं को देखा. खामोश बैठे.
2. निशान
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दस बजे नहीं कि सब निपटा कर बिस्तर पर . खुद को नींद आती नहीं है और मुझे सोने नहीं देंगी, देर रात तक . रूटीन .
” यह अंगुली पर क्या निशान है आपका ? ऐसे तो हमने किसी को चोट लगी नहीं देखी आज तक ?” मेरी अंगुली पर अपनी अंगुली घूमाते हुए उन्होने पूछा.
मैं हलके से हँसा. चलो बताये ही देता हूँ आज .
” लो सुनो , हम दूसरी क्लास में थे . मतलब मैं और वह लड़की . एक खेल होता था . अंगुली पर फूल उगाने का, मतलब बेवकूफ बना कर परेशान करना होता था . उसने कहा, ‘ लाओ तुम्हारी अंगुली पर फूल उगा दूँ .’ मुझे पता था वह मेरी अंगुली पर रेत घिसेगी और मैं थोड़ी देर में चिल्ला कर अपनी अंगुली खींच लूँगा – ‘ नहीं, नहीं, मुझे नहीं उगवाना फूल.’ पर मैंने कहा – ‘लो उगाओ.’ मैंने सोच लिया था आज मैं उसी को रुला कर छोडूंगा . वह रेत रगड़ने लगी तो मैं बोला, ‘ मगर तुम्हें मेरी कसम जो अपने आप मेरी अंगुली छोड़ो .’ उसे अंदाज़ा नहीं था खेल कहाँ तक जाएगा . वह रगड़ती रही और मेरी अंगुली की खाल उतरने लगी . मगर मैंने हाथ नहीं खींचा . वह रुआँसी होकर बोली , ‘अब तो हटा लो ना ! ‘
मैं अड़ा रहा . जखम सा हो गया . खून आने लगा . वह ज़ोर ज़ोर से रोने लगी . मेरी आँखों में दर्द से आँसू निकल रहे थे और मैं हँस भी रहा था . आख़िर उसे इस तरह रोते देख मुझे तरस आ गया और मैने अपना हाथ खींच लिया. बस उसी का निशान है.”
मेरे सीने पर सर रख, वे मेरी अंगुली सहलाती रही देर तक. चुपचाप.
शायद वे सोच रही थी – मैने भी कहीं छोड़ दिया है मन का एक टुकड़ा.
मगर नहीं, मैं जानता हूँ, यह उन तक पहुँचने की मेरी यात्रा का पहला पड़ाव था. और यह उसी खूबसूरत पड़ाव का निशान था.

पीछे की कहानी

सोमबहू पीहर से ही खुले स्वाभाव की थी, और ससुराल आकर भी उसकी चुहल और नयन मटक्के की आदत गयी नहीं. ऐसी औरतों की सीमा कहाँ तक होती हैं बस वे खुद ही जानती हैं पर लोगों की सुनो तो सब को पता होता हैं क्या गुल खिल रहे हैं. जब से सोमदत्त को ब्याह कर आई, मोहल्ले में अपने नाम से नहीं बल्कि सोमबहू के नाम से जानी गयी. नयन-नक्श ने सोमा भाई को जितना सम्मोहित किया हुआ था, अपनी जीवन संगिनी के क़िस्सों से उतने ही परेशान थे. दिन रात नज़र भी रखते थे. यहाँ तक कि कुएँ और मंदिर भी कई बार पीछे पीछे पहुँच जाते थे. मोहल्ले के लफँडरों का कहना है एक बार सोमाभाई ने पीपल में पानी देती अपनी पत्नी का हाथ पकड़ कर कहा, ‘ यही पानी हाथ में लेकर खा सौगंध कि तेरा किसी से कोई चक्कर नहीं हैं.’ कहते हैं कि मटी टस से मस नहीं हुई. नहीं खा के दी सौगंध.
उसके बाद तो बात बहुत बिगड़ गयी. सोमाभाई का सम्मोहन टूट गया और बात रोज़ाना की मार पीट तक पहुँच गयी.
उन दिनों सास या पति से हलकान होकर बहुएँ एक ही रास्ता ले रही थी- धम्म कुएँ में. बीस फुट पर पानी था. अगर फटा फट पता चल गया तो, जान बच जाती थी. सास और पति को अच्छी ख़ासी चेतावनी भी मिल जाती थी. सोमबहू कई दिन से रोज़ सोच भी रही थी और डर भी रही थी. एक दो वाकये ऐसे हुए थे कि जब तक खबर फैली, बाहर निकाला, तब तक पेट में पानी इतना भर गया था कि साँस ख़तम हो गयी.
आख़िर सोच समझ कर सोमबहू ने एक दिन मन बना ही लिया. सोमदत्त को याद दिलाना ज़रूरी हो गया था कि पहली शादी के तो तोड़े पड़े थे, दूजवर की तो कहीं बात भी नहीं चलेगी.
ताई रामदुलारी को उस दिन कुएँ पर साथ लेकर गयी सोमबहू. इसलिए कि उसके पानी में पहुँचते ही बुढ़िया शोर मचा दे. दो मिनिट की भी देरी नहीं हो.
ताई की निगाह जब सोमबाहू पर टिकी हुई थी एन उस वक़्त उसने कुएँ में छ्लान्ग लगा दी.
ताई राम दुलारी ने उसको पानी में पहुँचने तक देखा. मुस्कुराइ और चुपचाप अपने घर लौट आई.
आते वक़्त सोच रही थी – अब देखती हूँ सोमा की माँ खुद चल कर मेरे घर कैसे नहीं आती है. तीन साल तक खुशामद की थी अपनी भतीजी के रिश्ते के लिए, पर नहीं मानी. दहेज जो चाहिए था. मेरी भतीजी आज भी कुंआरी बैठी है.
सोमबहू को इस पीछे की कहानी का कोई इल्म नहीं था.

आराधना

‘ तुमने हमारी पहली रात एक बहुत ही तुच्छ सा सवाल किया था मुझ से…. ‘तुमने किसी से पहले प्यार किया है क्या?’ जवाब में मैने चुप्पी साध ली थी. एक बहुत लंबी चुप्पी. नौ साल लंबी हो गयी है मेरी खामोशी. आज जवाब देने का दिन आया है.’
बेखुदी में जया के कुछ आँसू गालों पर ही सूख गये थे, कुछ अभी भी बह रहे थे. उसने सबको समेटा और अपने आपको संयत किया.
‘आज तुम कह रहे हो तुम्हें किसी से प्यार हो गया है, और हमें अलग हो जाना चाहिए… तो सुनो! कोई था जो मुझ से बहुत प्यार करता था. मुझे उसके प्यार में कोई खोट नहीं दिखा पर फिर भी मैने अस्वीकार कर दिया था. तुम्हारा पुरुष का छिछला मन मेरे कारण को नहीं समझ पाएगा, इसीलिए मैने चुप्पी साध ली थी. पता नहीं मेरी चुप्पी का क्या मतलब निकाला होगा…’
‘नहीं मैने कभी तुम पर कोई शक़ …’ , अनिरूद्ध ने बीच में बात काट दी.
‘मैं नौ साल चुप रहीं हूँ… आज केवल मैं बोलूँगी.. प्लीज़’ , जया का लहज़ा सख़्त था.
‘ मैने उसका प्यार… उसका नाम भी आज याद आ गया है मुझे, पर तुम्हें नहीं बताऊंगी. मैं जानती हूँ तुम्हारी आख़िरी साँस तक वह नाम हथौड़े की तरह तुम्हारे दिमाग़ में बजेगा, इसलिए मेरी संवेदना मुझे इसकी इजाज़त नहीं देती है. दूसरे, उस नाम और उस व्यक्ति से ना मेरा आज कोई सरोकार है और ना ही कभी होगा.’ जया चुप हो गयी, शायद अपनी बात की तसदीक कर रह ही थी अपने मन में झाँक कर.
फिर स्थिर स्वर में बोली, ‘मैं एक स्त्री हूँ. मुझे नहीं पता था मेरा जीवन मुझे कहाँ ले जाएगा. इसलिए और केवल इसलिए मैं उसका या किसी का भी प्यार स्वीकार नहीं कर सकती थी. कोई बोझ अपने मन पर रख कर जीना स्वीकार नहीं था मुझे . सिर्फ़ इसलिए मैने उसका प्यार ठुकरा दिया था. तुम शायद यह बात भी नहीं समझोगे. पर अब कोई फ़र्क नहीं पड़ता अनिरूद्ध. …. मगर तुम एक बात अच्छे से सुनलो कि मैं अब बाकी जीवन उस प्रेम की आराधना करूँगी.’
अनिरूद्ध ने अचानक नज़र ऊपर उठाई.
‘नहीं चौंको मत… जो मेरे मन में पैदा हुआ था और जिसे मैने वहीं छोड़ दिया था, वह प्यार ना उसके लिए था ना तुम्हारे लिए. वह मेरे मन में उपजा मेरा प्यार था. प्यार एक आराधना है . और स्वयं ही आराध्य है. किसी की पूजा या किसी का प्रसाद नहीं है…. उस दिन वह गौण था आज तुम गौण हो गये.’
जया मुस्कुरा रही थी.

परत-दर-परत

राजकीय माध्यमिक पाठशाला मेहतावास के बच्चे छुट्टी होते ही जो हुड़दंग मचाते गाँव की ओर भागते हैं तो लगता है बड़े होकर ये सभ्यता को तहस नहस करेंगे. सबसे पीछे धीरे धीरे चलते, बतियाते आते हैं दीपू और पिंकी.
” इस से तो अच्छा है पापा मम्मी दोनों मर जाएँ .”
पिंकी चौंकती है, और धीरे से पूछती है, ” पर हम खाएँगे क्या फिर?”
दीपू ने जवाब पहले से सोच रखा है, ” स्कूल से छूटते ही कुंड के बस अड्डे पर जाएँगे, मैं गाऊँगा और तुम हाथ फैला कर साथ साथ चलना. देखना लोग बहुत पैसे देंगे.”
पिंकी आश्वस्त नहीं होती.
दहलीज पर बैठी बरफी अपनी कई दिनों बाद गाँव आई ननद से कह रही है, ” महेश के इन दोनों बच्चों को देख कितने सीधे हैं. माँ-बाप के पालन-पोषण का कितना फ़र्क होता है.”
घर पर गीता की आँख में आँसू अटका है, और गुस्से से तमतमा कर कहती है, “अगर ये बच्चे नहीं होते तो मैं एक दिन भी ओर तुम्हारे साथ नहीं रहती.”
महेश बिना उसकी ओर देखे, बेरूख़ी से जवाब देता है, ” मैं जानता हूँ. हर दूसरे दिन बताने की ज़रूरत नहीं है.”

तेरे बिन सूने ….

औरत उस अलौकिक संगीत की तरह है जो बजता है तो आनंदित करता ही है, मगर जब याद आता है तो फिर मन में बजने लगता है, और उतना ही आनंद देता है.
– माँ को ही देखो. जब थी तो गाँव में कहती थी, ” आज भरवाँ बैंगन बनाए हैं, अनुज को बहुत पसंद हैं.” और मुझे बंबई में सुनाई देता था. अब नहीं हैं तो लगता सब तरफ बस माँ ही है.
– माँ ही नहीं, प्रेमिका को लीजिए. कोई औरत एक बार आँखों में बस जाए तो जन्म भर एक ही तस्वीर दिखाई देती है .
– और बेटी… बस पूछिए मत. हर बाप को पता है. जब पास होती है, घर में चहकती रहती है, और जब दूर चली जाती है तो भी उसी की याद से घर महकता है.
मैं सोच ही रहा था कि आवाज़ आई, ” अब लॅपटॉप लेकर इस बीन बॅग में ही धन्से रहोगे! ११ बज गये. यह भी नहीं कि नहा कर बाथरूम को अच्छे से साफ कर दो.”
पत्नी जब डाँटती है तो आपका चेहरा नहीं देखती. पर उस दिन पंखा साफ करते उनकी नज़र मेरी आँखों की नमी पर पड़ गयी, जो अभी अभी गुज़रे ख्यालों की फुहार थी.
” क्या हुआ अब?” उनकी आवाज़ धँस सी गयी.
” कुछ नहीं जी, बस सोच रहा था आप नहीं होगी तो कैसे जी पाऊँगा.”
फिर बिगड़ गयी, ” बस मेरे मरने के ही ख्वाब देखते रहा करो. उम्र से पहले ही सठिया गये हो. उठो यहाँ से.”
मैं गुनगुनाता हुआ उठा, ” तेरे बिन सूने नयन हमारे..”
बाथरूम में जाने से पहले कोई ना कोई गाना होंठो पर आ ही जाता है.
मुझे पता है, वे बाहर से एक बार फिर झिड़क कर बोलेंगी, ” कुछ गाना आता तो पता नहीं क्या करते. जल्दी निकलो.”
बताइए क्या है ज़िंदगी…ऐसे साथी के बिना…एक शून्य… एक खला.

रीक्लेमेशन

चरित्रहीन पुरुष दूध पीती बिल्ली की तरह होता है; नीयत से चालक पर आत्मा से अँधा. राकेश जितना मृदुल है, चरित्र का उतना ही ढीला. ऐसे पुरुषों के हिस्से दो तरह की पत्नियाँ आती हैं. एक तो वे सीधी सरल जिनके लिए सच उतना ही होता है जितना कि वे जानती हैं, और दूसरी वे जो मन के क्षय को पूरा करने के लिए अपना अधिकार क्षेत्र थोड़ा बढ़ा लेती हैं जैसे धरती समुद्र से अपने पाटे हुए हिस्से को धीरे धीरे रीक्लेम कर लेती है. राकेशों से लिपटी औरतें इस कहानी का हिस्सा नहीं हैं. अपनी पूनम भी पहली तरह की थी…. मगर पहले पहले.
ऐसा चरित्र एक दिन उजागर तो होता है पर कभी भी गुनहगार रंगे हाथों अर्थात विथ पेंट्स डाउन नहीं पकड़ा जाता है. लाज़िम है, जब कबूतर जैसा आलसी परिंदा और कुत्ते जैसा निर्लज्ज जानवर ही यदा कदा यह ‘जुर्म’ करते पकड़े जाते हैं तो स्त्री-पुरुष तो बंद सुरक्षित कमरों में रहने वाले जीव हैं. और फिर इस ज्ञान के लिए कि कभी ग़लत समय घंटी बज जाए तो सबसे पहले कपड़े पहन कर बाल ठीक करने होते हैं, कॉलर सीधी करनी होती है या बिंदी, लिपस्टिक जांचनी होती है, कोई काम-शास्त्र पढ़ने की ज़रूरत नहीं है. और इतना बस हो जाए तो शातिरमन लागों को कई दरवाज़े मिल जाते हैं.
राकेश को मरवाया उसके मोबाइल ने. ऐसे मेसेज थे कि संदेह के लिए कुछ नहीं था जो कुछ था कल्पना के लिए, एक से एक बढ़ कर, कि जब आमना सामना हुआ तो पूनम को इतना ही बोलना था, ” अब कुछ नहीं बचा है.”
राकेश की सौम्यता ने अपराध-भाव पहना, और हाथ सीधा पूनम के घुटने पर रखा जो इस स्थिति में झटका जाना ही था.
” मैं तुम्हारा गुनहगार हूँ पूनम मुझे माफ़ कर दो.”
पूनम को लगा किसी ने उसकी गर्दन पकड़ कर पानी में दबोच दी है.
आधे मिनिट के बाद उसे साँस आया जब राकेश ने कहा, “तुम मेरी बात का विश्वास नहीं करोगी पर इस औरत से मेरा कोई शारीरिक संबंध नहीं है. मैं बहक गया था, और यह देखना चाह रहा था कि यह औरत किस हद तक जा सकती है. फिर भी मुझसे वही गुनाह हुआ है जो मैने दरअसल नहीं किया है.”
क्या बात है? ताली बजाने का जी करता है. झूठ वह तिनका है जो डूबते को सचमुच बचा सकता है.
इधर अपनी पूनम भी कितनी ही सीधी हो पर उसे एक एहसास था कि राकेश के रिश्ते में वफ़ाई छोड़ कर उसे बहुत कुछ मिला है. और शादी के कुछ महीने बाद ही अपना पूरा अस्तित्व जो उसने राकेश को सौंप दिया था, थोड़ा थोड़ा रीक्लेम करना शुरू कर दिया था. कोई था जिससे वह अपने अंतर्मन के भाव बाँटने लगी थी.
इस घटना के बाद उसने इस को, जो कोई भी था, हल्का सा छूने दिया. हल्के से स्पर्श से थोड़ा और रीक्लेम किया अपना खोया हुआ हिस्सा.
पर विश्वास कीजिए, वह समुद्र से ऊपर रहेगी. उसे जीना है. ना प्यार करना है, ना समर्पण. वह जानती है.