पीरगढ़ की बहुएँ

जम्बू द्वीपे भरतखंडे एक छोटी सी नगरी है. नाम है पीरगढ़.
पीरगढ़ में आई एक नई बहू को एक दिन अजीब और शर्मनाक अनुभव हुआ. सपने में किसी ने उसके साथ बलात्कार किया. बहुत विचलित हुई, पर बात को मन में दबा कर रह गयी. दो तीन दिन बाद फिर वही दुस्वपन, वैसा ही आदमी, अकेली पाकर उसकी ओर आया और जबरन उसके साथ दुष्कर्म किया. किसी को बता भी नहीं सकती थी. सुनने वाला यही कहेगा, ” जो मन में होगा वही सपने में आएगा.” फिर तो यह बार बार होने लगा.
एक दिन उसने हिम्मत की और अपनी बहुत ही नेक दिखने वाली पड़ोसन को विश्वास में लेकर बता ही दिया. पड़ोसन कुछ पल तक हैरानी से उसका चेहरा देखती रही, फिर बोली, ” सच कह रही है तू? मैं तो समझ रही थी मेरे अकेली के साथ ही ऐसा हो रहा है. लेकिन कब तक छुपाएँगे, किसी से तो बात करनी ही पड़ेगी?”
उन दोनों ने कुछ और बहुओं से दबी ज़बान में अपनी बात कही तो पता चला बहुतों के साथ ऐसा ही हो रहा है. बस सब शर्म के मारे चुप हैं. धीरे धीरे सब में घुसर फुसर होने लगी. किसी ने बताया,” यह तो कोई अभिशाप है इस नगरी की बहुओं को. भगवान कृष्ण के भजन करो, गीता का पाठ सुनो.” फिर भी पीछा नहीं छूटा तो किसी ने कहा,” अरे हमारे भजन करने से क्या होगा, वे दुष्कर्मी जो हमारे सपने में आते हैं उनका भगवान कुछ करे तभी तो छुटकारा मिलेगा.”
संकट तो तब गहराया जब उनमें से कई गर्भवती हो गयी. ” हे भगवान अब क्या होगा? अगर यह संतान उस बलात्कारी की ही हुई तो जनम ही भ्रष्ट हो जाएगा.” कुछ ने सूझाया आत्महत्या कर लेनी चाहिए.
आख़िर बात पीरगढ़ की सबसे वृद्ध औरत के पास पहुँची तो उसने भजन के बहाने सभी बहुओं को मंदिर में बुलाया
अपनी काँपती आवाज़ में कहा,” एक बात बताओ, तुम में से कभी कोई अपने सपने में मरी है क्या?”
सब सोच में पड़ गयी. विचार कर सबने एक साथ कहा, ” नहीं दादी जी, मरने से पहले तो सपना टूट जाता है.”
बुढ़िया के चेहरे पर पीर भरी मुस्कान आई,” बस तो, समझ लो बलात्कार तो मौत से भी बुरा है. ऐसा सपना हो ही नहीं सकता जो ऐसा जघन्य पल आने से पहले नहीं टूटे. बहुओ, तुम्हारा सपने में नहीं सचमुच बलात्कार हो रहा है. पीढ़ियों से औरत का बलात्कार हो रहा है. बस तुम नयी बहुओं को लग रहा है कि यह सब सपने में हो रहा है.”
बुढ़िया ने साँस ली.
” ऐसा इसलिए है कि तुम्हें थोड़ी आज़ादी मिल गयी है और कभी कभार तुम अपने पति से पहले सो जाती हो. पर हाँ, इसमें कोई शक़ नहीं जो संतान तुम पैदा करोगी वह बलात्कारी की ही होगी. जैसे कि तुम्हारे पति हैं. “

Advertisements

शिक्षा ज़रूरी है

नीलिमा का टिफिन बनाते हुए मम्मी कह रही थी, ‘ अच्छे से खा लेना. आज पहला दिन है कॉलेज का…. और ठीक से रहना.’
आवाज़ में एक हल्की सी कंपकंपी थी. जो मन में था नहीं कह पा रही थी- ‘ कोई लड़का अगर छेड़खानी करे तो घबराना मत, घर पर आकर बता देना.’ फिर सोचा- ‘ यह भी कोई कहने की बात है. शी!’ मम्मी ने अपना सर झटका.

स्कूटी पर बैठी तो पापा बाहर निकले, ‘ स्कूटी संभाल कर चलाना, पहला दिन है…. और हाँ अच्छे से..’ पापा की आवाज़ में एक अजीब सी परेशानी थी, लगता है कुछ था अनकहा मन में- ‘कोई लड़का बदमाशी करे, तो डरना मत, बस आकर एक बार मुझे बता देना.’ मन में ही रख गये… क्यों ग़लत बात मुँह से निकाली सुबह सुबह.

शाम को नीलिमा लौटी तो घबराई हुई भी थी, और डरी हुई भी. मम्मी से नहीं रहा गया, आशंका कलेजा कुतर रही थी.

‘ठीक तो है ना बेटी. कॉलेज में कुछ हुआ तो नहीं ना!’

‘कॉलेज में क्या होगा मम्मी, बस थक गयी हूँ.’ नीलिमा ने चिढ़ कर कहा.

पापा पूछें तब तक वह अपने चेहरे से घबराहट और डर धो लेगी.

हुआ था कॉलेज में. जब भीड़ में तंग सीढ़ियों पर चढ़ रही थी तो एक हाथ सीधा उसकी छाती पर लगा. उसकी डर के मारे हल्की सी चीख निकल गयी थी .
गर्दन घुमाई तो एक लड़का जिसके गालों पर हँसी थी, और आँखें भेड़िए की तरह चमक रही थी, बोला, ‘ देख क्या रही है, माफ़ कर दे, ग़लती होगी.’

नीलिमा पूरे समय सिहरी रही, और लड़कियों के बीच दुबकी रही. टिफिन भी नहीं खाया. भरा टिफिन घर ले गयी तो प्रमाण बन जाएगा. रास्ते में कुत्तों को डाल दिया.
मम्मी के मन की घबराहट, पापा के दिमाग़ की परेशानी, और नीलिमा का डर अपनी अपनी जगह दुबक कर बैठे हैं.

वैसे सब ठीक ही है, जब तक कुछ बहुत अशुभ नहीं होता है.
शिक्षा ज़रूरी है. सबके लिए.